राणा सांगा की पराजय के कारण-


खानवा क युद्ध मराणा सांगा की निर्णय पराजय हुई। प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि सांगा के पास, बाबर की अपेक्षा अधिक मना हुए भी तथा श्रेष्ठ सैनानायकों के होते हुए भी सांगा की पराजय क्यों हुई? खानवा के युद्धराणा सांगा की पराजय के अनेक कारण थे, जिनमें मुख्य निम्नलिखित थे।

(1) राजपूत सेना संख्या में मुगलों से अधिक होते हुए भी एक नेता के अधीन संगठित नहीं थी, बल्कि भिन्न भिन्न राजपूत राजाओं और सामन्तों के अधीन थी, जिनकी स्वामिभक्ति राणा की अपेक्षा अपने सामन्तों एवं राजाओं के प्रति अधिक थी। ऐसी स्थिति में सेना में अनुशासन बनाये रखना सम्भव नहीं था तथा राजपूत सेना में आपसी तालमेल का अभाव था। (2) राणा सांगा को बाबर की सैन्य व्यवस्था तथा रण-कौशल एवं तुलुगमा पद्धति की विशेष जानकारी नहीं थी। सांगा ने बाबर को साधारण शत्रु समझकर राजपूतों की परम्परागत युद्ध पद्धति को अपनाया, जो बाबर की नवीन युद्ध व्यवस्था के समक्ष अधिक समय तक नहीं टिक सकी। बाबर की तुलुगमा पद्धति इतनी कारगर एवं प्रभावशाली थी कि राजपूत इस पद्धति को तथा बाबर की चाल को न समझ सके। परिणाम यह हुआ कि अचानक वे मुगल सेना से घिर गये और लड़ते हुए मारे गये। (3) राणा सांगा की पराजय का एक कारण मुगलों के अश्वारोही सैनिक दस्ते की गतिशीलता तथा चातुर्यपूर्ण रण-कौशल था। राणा के अधिकांश सैनिक पदाति थे और अश्वारोही सैनिक दस्ता था भी तो वह तेज गति से चलने वाले मुगल अश्वारोही सैनिक दस्ते की तुलना में अत्यन्त निम्नतर सिद्ध हुआ। (4) राणा सांगा की पराजय का एक महत्त्वपूर्ण कारण बाबर का तोपखाना था। मुगलों की आग उगलती हुई तोपों के समक्ष राजपूतों के परम्परागत हथियार और उनका शौर्य सफल नहीं हो सका। भला आग उगलती तोपों और दनदनाती गोलियों के समक्ष तीर-भाले कितने समय तक टिक पाते? फिर, बाबर के तोपखाने और अश्वारोही सैनिक दस्ते में इतना कुशल सामंजस्य था कि उनके समक्ष राणा के हाथियों और पैदल सैनिकों की कतारें बेकार सिद्ध हुई। राजपूत अचानक युद्ध में कूद पड़ते थे और बिना सोचे-समझे शत्रु सैनिकों के बीच तथा आग उगलती तोपों के बीच आगे बढ़ने का प्रयास करते थे, जिसका परिणाम होता था-केवल मृत्यु। जबकि मुगल सैनिक कुशल रण-नीति अपनाते हुए, परिस्थितियों को देखते हुए आगे बढ़ते थे या पीछे हटते थे। राजपूत मरना जानते थे, लड़ना नहीं, जबकि मुगल मरना नहीं, लड़ना और जीतना जानते थे। क्योंकि वे जानते थे कि पराजय की स्थिति में वे भागकर हजारों मील दूर अपने देश नहीं पहुँच पायेंगे। अत: वे प्राणप्रण से लड़ने में विश्वास रखते थे। मुगलों में राजपूतों की अपेक्षा युद्ध करने की लगन अधिक थी।

(5) सांगा का अपने आपको युद्ध में झोंक देना, उसकी पराजय का कारण बन गया, अपने आपको शत्रु के सामने नहीं आने दिया। सांगा बिना सोचे-समझे स्वयं युद्ध में उतर आया तथा शत्रु के सामने आते हा शत्रु का उस पर वार करने का अवसर मिल गया। अतः शत्रु और साहस धीरे-धीरे कम होता गया और अन्त में वे युद्ध क्षेत्र से भाग खड़े हुए। (6) बयाना पर विजय प्राप्त करने के बाद राणा सांगा ने सीधा सीकरी की ओर न आकर भुसावर होते हुए सीकरी का माग पकड़ा, फलस्वरूप उसने एक महीना व्यर्थ में ही नप कर दिया। इससे मुगलों को विश्राम करने, युद्ध स्थल में उचित स्थान का चयन करने नया पर्याप्त तैयारी करने का समय मिल गया। इसके विपरीत सांगा, जब भुसावर का चक्कर काटकर युद्ध मैदान में पहुँचा तो उसे तैयारी का पर्याप्त समय भी नहीं मिला और थके-माँद में राजपूतों को तत्काल युद्ध म कूदना पड़ा। यदि सांगा बयाना से सीधा सीकरी पहुँचकर हतोत्साहित भुगलों पर धावा बोल देता तो युद्ध का परिणाम ही दूसरा होता।

(7) युद्ध के आरम्भ होने तक सांगा को यही गलतफहमी रही कि वह शीघ्र ही अपनी विशाल सेना की सहायता से शत्रु को पराजित कर देगा। इसलिए उसने अपने बचाव को कोई सुरक्षात्मक सावधानी नहीं दिखायी। फिर, विशाल सेना के कारण चित्तौड़ से बयाना और तत्पश्चात् बयाना से सीकरी जाते समय उसकी रफ्तार बहुत ही कम रही। इन गम्भीर त्रुटियों के कारण राणा स्वयं ही अपनी पराजय का कारण बन गया। (8) कर्नल टॉड, हरबिलास शारदा, श्यामलदास आदि इतिहासकारों की मान्यता है कि युद्ध के अन्तिम दौर में सलहदी तंवर तथा नागौर के खानजादा द्वारा राणा से विश्वासघात करके मुगलों से मिल जाता युद्ध का निर्णय करने में सहायक रहा। यह सही है कि जब युद्ध निर्णायक स्थिति में पहुँचा हुआ था तथा सलहदी और खानजादा द्वारा राणा का पक्ष त्यागने और बाबर से मिल जाने से राजपूतों के मनोबल पर अवश्य ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ा होगा। लेकिन ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि सलहदी और खानजादा ने अपना पक्ष उस समय बदला था जबकि राणा को घायल एवं मूर्छित अवस्था में युद्ध क्षेत्र से ले जाया जा चुका था और राजपूत सेना पराजय के कगार तक पहुंच चुकी थी। इस समय यदि वे अपना पक्ष नहीं बदलते तो भी राजपूतों की पराजय को नहीं बचाया जा सकता था। वास्तव में सलहदी के पक्ष बदलने से पहले ही राणा की पराजय सुनिश्चित हो चुकी थी। फिर भी, जैसा कि निजामुद्दीन ने लिखा है कि किसी अदृश्य सेना ने मुगल पक्ष सहायता की, इस संकेत के आधार पर अनेक विद्वानों का मानना है कि सलहदी के पक्ष परिवर्तन का अवश्य ही महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा था, क्योंकि उनके विचार में सलहदी के अधीन लगभग 30-35 हजार सैनिक थे और इतनी विशाल सेना का अचानक शत्रु पक्ष की ओर चले जाने से निश्चय ही राणा की पराजय पर प्रभाव डाला था। एलफिन्स्टन और डॉ. ओझा की तो मान्यता है कि बयाना से शीघ्र सीकरी न पहुँचना ही राणा की पराजय का मुख्य और महत्त्वपूर्ण कारण था।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *