राणा सांगा और बाबर

यद्यपि राणा सांगा ने भारत के शक्तिशाली सुल्तानों को पराजित कर सम्पूर्ण भारत में ख्याति अर्जित करली थी, परन्तु उसे अब उसके समान ही साहसी एवं पराक्रमी से मुकाबला करना था, और वह पराक्रमी था-जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर । भारत में मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर की गणना एशिया के श्रेष्ठ एवं सम्मानित शासकों में की जाती है। बाबर ने भी राणा सांगा की भाँति जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे थे। मध्य एशिया में फरगना और समरकन्द के अपने पैतृक राज्य खोने के बाद वह काबुल का नया राज्य प्राप्त करने में सफल रहा। किन्तु बाबर जैसा महत्त्वाकांक्षी शासक छोटे-से काबुल के राज्य से सन्तुष्ट नहीं हो सकता था। अतः जब मध्य एशिया में वह अपना साम्राज्य स्थापित करने में असफल रहा तब उसने हिन्दुस्तान को जीतने का निश्चय किया। संयोगवश सिकन्दर लोदी की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत की केन्द्रीय सत्ता लड़खड़ाने लग गयी थी। इब्राहीम लोदी के व्यवहार से अनेक लोदी सरदार असन्तुष्ट होकर उसके विरोधी बन गये थे। उनमें से कुछ लोदी सरदारों ने इब्राहीम लोदी के विरुद्ध बाबर से सहायता माँगी। बाबर तो ऐसे अवसर का इन्तजार ही कर रहा था। अतः लोदी सरदारों का निमन्त्रण मिलने पर उसने हिन्दुस्तान को जीतने और वहाँ अपना साम्राज्य स्थापित करने का संकल्प कर लिया। 1526 ई. में पानीपत के प्रथम युद्ध में उससे सुल्तान इब्राहीम लोदी परास्त होकर मारा गया। इस निर्णायक विजय के फलस्वरूप बाबर, दिल्ली व आगरा का स्वामी बन गया। किन्तु भारत में साम्राज्य स्थापित करने के लिए। यह विजय पर्याप्त नहीं थी।

पानीपत की विजय के बाद भी बाबर अपने शत्रुओं से घिरा हुआ था। बिहार और उत्तर प्रदेश में अफगान अपनी शक्ति संगठित कर रहे थे और जो पानीपत में पराजित हो चुके थे, वे कालपी, कन्नौज, इटावा, धौलपुर, ग्वालियर आदि स्थानों पर जाकर वहाँ के शासक बन गये थे। इब्राहीम लोदी का भाई महमूद लोदी अफगानों की शक्ति को संगठित कर रहा था। राजस्थान में राणा सांगा के नेतृत्व में राजपूत भी शक्तिशाली बन चुके थे। अतः भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने तथा सर्वोच्च सत्ता ग्रहण करने के लिए इन सभी शक्तियों को परास्त करना अनिवार्य था। किन्तु प्रश्न यह था कि पहले अफगानों से निपटा जाय अथवा राजपूतों से। बाबर के विचार में अफगानों से भी अधिक खतरा राणा सांगा से था। बाबर के समान राणा सांगा भी भारत में अपनी सर्वोच्च सत्ता स्थापित करने की आकांक्षा रखना था। अत: पहले किस शत्रु से निपटा जाय, इस प्रश्न पर विचार करने के लिए बाबर ने अपनी सैन्य समिति की बैठक बुलायी। सैन्य समिति ने बाबर को पहले अफगानों से निबटने का परामर्श दिया। किन्तु बाबर ने सांगा की शक्ति और महत्त्वाकांक्षा को ध्यान में रखते हुए, समिति के परामर्श को ठुकरा दिया तथा पहले सांगा से निपटने का निश्चय किया। तदनुसार बाबर ने अपनी सैनिक तैयारियाँ आरम्भ कर दीं।

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