मालवा की समस्यामालवा की समस्या

-पूर्व पृष्ठों में बतलाया जा चुका है कि मालवा के सुल्तान महमूद खलजी द्वितीय ने मेदिनीराय की सहायता से अपनी स्थिति मजबूत करली थी। कुछ ही दिनों में मालवा की शासन व्यवस्था पर मेदिनीराय का पूरा नियन्त्रण स्थापित हो गया तथा मेदिनीराय ने अपनी शक्ति इतनी बढ़ा ली कि महमूद खलजी केवल नाममात्र का सुल्तान रह गया। इससे मालवा के मुस्लिम सरदारों में भीषण असन्तोष उत्पन्न हो गया। उन्हें इस बात की भी गलतफहमी हो गयी कि उनके प्राण संकट में पड़ गये हैं। अत: वे अपनी प्राण रक्षा हेतु मालवा छोड़कर भागने लगे। स्वयं सुल्तान को भी मेदिनीराय की निष्ठा पर सन्देह हो गया और वह भी भागकर गुजरात चला गया, जहाँ मुजफ्फरशाह ने उसका हार्दिक स्वागत किया। मेदिनीराय ने सुल्तान महमूद खलजी द्वितीय को अनेक सन्देश भिजवाये कि वह मालवा लौट आये।

लेकिन महमूद को अभी भी मेदिनीराय पर सन्देह होने के कारण वह लौटकर मालवा नहीं गया। जनवरी 1518 ई. में गुजरात और मालवा के सुल्तानों ने मेदिनीराय के विरुद्ध कूच किया। मेदिनीराय ने माण्डू दुर्ग की रक्षा का भार अपने पुत्र नत्थू को सौंपकर स्वयं राणा सांगा से सहायता प्राप्त करने मेवाड़ चला गया। जाने से पूर्व उसने अपने पुत्र को आदेश दिया था कि वह हर स्थिति में आक्रमणकारी को एक महीने तक रोके रखे ताकि वह मेवाड़ से सहायता लेकर आ सके। इधर मुस्लिम सेनाओं ने माण्डू दुर्ग को घेर लिया। इस अवसर पर नत्थू ने मुजफ्फरशाह को कहलवाया कि वह युद्ध विराम स्वीकार करले, एक माह बाद दुर्ग उन्हें सौंप दिया जायेगा। लेकिन मुजफ्फरशाह को मेदिनीराय के मेवाड़ जाने की जानकारी मिल चुकी थी। अतः उसने नत्थू के प्रस्ताव को ठुकराते हुए दुर्ग पर जबरदस्त आक्रमण कर अधिकार कर लिया। इस संघर्ष में मेदिनीराय का पुत्र, उसके परिवार के अनेक सदस्य तथा कई सैनिक मारे गये। अत: अब तो मालवा-मेवाड़ संघर्ष अवश्यम्भावी हो गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *