गुजरात के सुल्तान द्वारा आक्रमण

-राणा सांगा द्वारा ईडर पर अधिकार करने तथा की मुस्लिम सेनाओं की पराजय ने गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह द्वितीय को क्रुद्ध कर दिया और उसने मेवाड़ पर आक्रमण करने का निश्चय किया। तदनुसार सुल्तान ने एक विशाल सेना के साथ मलिक एयाज और किवा-उल-मुल्क को मेवाड़ की तरफ भेजा। 1521 ई. के आरम्भ में गुजराती सेना मोडेसा पहुँची, जहाँ से कुछ सैनिक दस्ते बागढ़ क्षेत्र पदाकान्त करने भेजे गये। इसी के साथ गुजराती सेना ने डूंगरपुर पर आक्रमण किया, जहाँ। रावल गज्जा गुजराती सेना से लड़ता हुआ मारा गया। डूंगरपुर में भयंकर लूटमार कर गुजर सेना सागवाड़ा और बांसवाड़ा होती हुई आगे बढ़ी। यहाँ से बागड़ के शासक रावल उदया तथा मेदिनीराय के परिवार के कुछ सदस्यों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। तत्पर गुजराती सेना मन्दसौर की तरफ आगे बढ़ी। मन्दसौर सांगा का आश्रित राज्य था तथा यहाँ । शासन व्यवस्था के लिए सांगा ने अशोकमल परमार को नियुक्त किया था। सांगा को गुजराती सैनिक अभियान की सूचना मिलते ही वह भी पूरी तैयारी के पक्ष मन्दसौर की तरफ रवाना हुआ तथा मन्दसौर से 25 मील दूर नन्दसा नामक स्थान पर अपनी शिविर लगाया। उधर मलिक एयाज ने मन्दसौर का घेरा डाल दिया। मालवा का सुल्ता महमूद खलजी द्वितीय भी गुजराती सेना की सहायतार्थ आ पहुँचा। कुछ दिनों के परिश्रम बाद गुजरात की सेना दुर्ग की दीवारों को उड़ाने तथा प्रवेश योग्य मार्ग प्राप्त करने में सफल हो गयी। परन्तु दुर्ग रक्षक राजपूत चौकन्ने थे। अत: उनके भीषण प्रतिरोध के कारण गुजरात सेना दुर्ग में प्रेवश न कर सकी। इस समय एयाज और उसकी सेना में उचित तालमेल न हो। के कारण एयाज को अधीनस्थ सेनानायकों का पूरा-पूरा सहयोग नहीं मिल पा रहा था। सम्भवतः उनमें पारस्परिक मनमुटाव चल रहा था। ऐसी स्थिति में सांगा ने कूटनीति का सहारा लेते हुए मालवा के सुल्तान को मालवा लौट जाने के लिए राजी कर लिया।

जिप समय सांगा ने महमूद खलजी को चित्तौड़ से ससम्मान मुक्त किया था उस समय उसके एव पुत्र को सांगा ने जमानत के तौर पर अपने पास रख लिया था। अतः इस समय सांगा ने महमूद को सन्देश भिजवाया कि यदि वह वापिस लौट जाता है तो उसके पुत्र को उसके पास भिजव दिया जायेगा। इस पर अब महमूद की युद्ध में कोई रुचि नहीं रही और वह वापिस लौट गया। उसके लौटते ही मलिक एयाज को अपनी निर्बल शक्ति का अनुभव हुआ और युद्ध में अपनी पराजय की सम्भावना देखकर वह भी वापिस लौट गया। बिना युद्ध किये लौट आने के कारण मुजफ्फरशाह ने उसकी काफी भर्त्सना की तथा सभी ने उसे कायर कहकर अपमानित किया। मुस्लिम इतिहासकारों का कथन है कि राणा ने अपने पुत्र के साथ बहुमूल्य उपहार भिजवाकर गुजराती सेना को वापिस लौटा दिया। किन्तु यह सत्य नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा हुआ होता तो गुजरात का सुल्तान उसकी भर्त्सना न करके पुरस्कृत करता। डॉ. नगेन्द्र सिंह ने काफी ठोस तर्क देकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि इस सम्पूर्ण अभियान में गुजराती सेना को कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई और सांगा अपनी कूटनीति और उपस्थिति से मेवाड़ की रक्षा करने में सफल रहा। डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने लिखा है कि “मलिक एयाज ने युद्ध में पराजित होने की सम्भावना से राणा से सन्धि कर ली जिससे सुल्तान को भी लौटने के लिए विवश होना पड़ा।”

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