गागरोण का युद्ध

-गुजरात की सहायता से माण्डू प्राप्त करने के बाद भी खलजी द्वितीय को मेदिनीराय का भय बना रहा, क्योंकि उसे विश्वास था कि मेदिनीराय अपने पत्र और परिवार के सदस्यों की मौत का बदला लेकर रहेगा। अत: सांगा के लौटने के बाद वह मेदिनीराय की शक्ति को कुचलने के उद्देश्य से एक विशाल सेना लेकर गागरोण का ओर बहा। मेदिनीराय को इसकी सूचना मिलते ही उसने सांगा को सहायता देने की प्रार्थन को। स्यांगा तत्काल ससैन्य मेदिनीराय की सहायता के लिए गागरोण की तरफ रवाना हुआ। महमूद खलजी द्वितीय गागरोण का घेरा डाले हुए था, लेकिन जब उसे सांगा के आने की सूचना मिली तो उसने दुर्ग का घेरा उठा लिया और सांगा से निपटने चल पड़ा। फरिश्ता के अनुसार महमूद ने अपने सेनानायकों की सलाह के विपरीत अपनी सेना को तत्काल सांगा की सेना पर आक्रमण करने का आदेश दे दिया। किन्तु निजामुद्दीन ने लिखा है कि मालवा की सेना को देखते ही सांगा ने अपनी सेना को तत्काल आक्रमण करने का आदेश दे दिया। आक्रमण करने में पहल किसी ने भी की हो, दोनों पक्षों के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें सांगा को निर्णायक विजयश्री प्राप्त हुई। महमूद बूरी तरह से घायल होकर अपने घोड़े से गिर पड़ा। महमूद को बन्दी बना लिया गया। सांगा उसे अपने शिविर में लाया तथा स्वयं अपनी निगरानी में उसके घावों का उपचार करवाया। सुल्तान महमूद खलजी का रत्नजड़ित कमरबन्द और ताज सांगा ने अपने अधिकार में ले लिये। तत्पश्चात् हाड़ौती और रणथम्भौर की सीमाओं से लगे उत्तर-पूर्वी मालवा के कुछ क्षेत्र अधिकृत करने के बाद सांगा महमूद को लेकर चित्तौड़ आ गया। महमूद को लगभग छः महीने चित्तौड़ दुर्ग में बन्दी बनाकर रखा गया। जब महमूद के सभी घाव ठीक हो गये तब सांगा ने उसे ससम्मान मालवा भिजवा दिया। निजामुद्दीन ने लिखा है कि “लड़ाई में फतह पाने के बाद दुश्मन को गिरफ्तार करके पीछे उसको राज्य दे देना, यह काम आज तक मालूम नहीं कि किसी दूसरे ने किया हो।” परन्तु मिराते सिकन्दरी में लिखा है कि सांगा ने दूसरे मुस्लिम सुल्तानों के सम्भावित प्रतिशोध से महमूद खलजी को छोड़ दिया था। इस कथन पर शायद ही विश्वास किया जा महमूद को मुक्त किया था

डॉ. ओझा और हरबिलास शारदा ने सांगा की इस कार्यवाही को उसकी राजनीतिक अदूरदर्शिता बताया है। किन्तु डॉ. गोपीनाथ शर्मा लिखते हैं कि, “हमारे विचार से राणा का ऐसा करना बुद्धिमानी का द्योतक है। जब वह दूरस्थ माण्डू पर अपना अधिकार नहीं रख सकता था तो वह ऐसी उदारता से क्यों न शत्रु को जीतता। कम से कम मालवा के सुल्तान पर अपना प्रभाव स्थापित कर उसने गुजरात के सुल्तान को भी निर्बल बना दिया। इस मैत्री सम्बन्ध से गुजरात-मालवा के गुट की सम्भावना कम हो गयी। मेदिनीराय को अपना आश्रित बनाकर उसने एक सशक्त संरक्षक मेवाड़ की सीमा पर स्थापित कर दिया। इस प्रकार को नीति गहाराणा कुम्भा की नीति का अनुसरण मात्र थी जो हर प्रकार से समयोचित थो।”

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