खानवा युद्ध के परिणाम

अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण और खानवा युद्ध दूरगामी सिद्ध हुए। खानवा का युद्ध देश के निर्णायक युद्धों में माना जाता है। कुछ विद्वानी तो इसे भारतीय इतिहास में पानीपत के प्रथम युद्ध से भी अधिक महत्त्वपूर्ण माना है सांगा की यह पराजय केवल राजस्थान के लिए ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारत के लिए पाता प्रमाणित हुई। इस पराजय ने राजपूतों की रही-सही एकता को ही समाप्त नहीं किया, बलि मुगल शक्ति के समक्ष राजपूतों की शक्तिहीनता भी प्रकट कर दी। खानवा की पराजय के बाद अगले दो सौ वर्षों तक राजपूत शासक, राजपूत संघ का निर्माण नहीं कर सके। इस पद के बाद भुगलों को इतने विशाल पैमाने पर किसी भी संगठित शक्ति ने चुनौती नहीं दी। पराजय के बाद कई वर्षों तक राजस्थान का मुगलों के साथ कोई सम्पर्क नहीं रहा। राजस्थान विजय के लिए मुगलों के प्रयत्न अकबर के सिंहासनारूढ़ होने के बाद ही आरम्भ हुए। डॉ. एस. आर. शर्मा ने लिखा है कि, “राजपूतों की सर्वोच्चता का भय जो 10 वर्षों से मंडरा रहा था, वह सदैव के लिए समाप्त हो गया।” डॉ. रघुवीर सिंह ने लिखा है कि, “राजस्थान के पूर्व आधुनिक इतिहास का मुगलकालीन भाग खानवा के युद्ध से ही प्रारम्भ होता है। खानवा के युद्ध के फलस्वरूप राजस्थान की बदली हुई राजनैतिक परिस्थिति के कारण ही आगे चलकर राजस्थान पर मुगलों का एकाधिपत्य हो सका।” पानीपत की विजय ने तो बाबर को दिल्ली और आगरा का ही शासक बनाया था और इन पर भी उसका अधिकार अभी सुरक्षित अवस्था में नहीं था, किन्तु खानवा की विजय ने उसे सांगा के भय से मुक्त कर, उसे उत्तरी भारत का निष्कण्टक शासक बना दिया।

अब बाबर के लिए अफगान सरदारों को भी, जिन्होंने पानीपत के युद्ध में पराजित होने के बाद देश के विभिन्न भागों में संगठित होना और सिर उठाना आरम्भ कर दिया था, दबाना आसान हो गया। अब अफगानों को भी राजपूतों के सहयोग की आशा समाप्त हो गयी, क्योंकि उन्होंने अनुभव किया कि जब राजपूत स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सके तो फिर दूसरों की रक्षा कैसे कर सकते हैं, अत: उन्होंने राजपूतों के सहयोग से मुगलों को भारत से खदेड़ने की आशा छोड़ दी। राजस्थान के लिए इस युद्ध के परिणाम अच्छे नहीं रहे। सांगा की पराजय और मृत्यु के बाद मेवाड़ की दशा तो बिगड़ी ही, लेकिन साथ ही राजस्थान के अन्य शासकों में भी इतनी शक्ति और साहस नहीं था कि वे मुगलों की नवोदित शक्ति को चुनौती दे सकें। डॉ. रघुवीर सिंह और डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने लिखा है कि खानवा में राजपूतों की पराजय के बाद राजपूतों का बल पूरी तरह टूटा नहीं था, हाँ, कुछ समय के लिए उनकी शक्ति का सूर्यास्त अवश्य हो गया था। डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने लिखा है कि इस युद्ध से बाबर ने सबक सीखा और उसने फिर कभी राजस्थान पर आक्रमण करने का विचार नहीं किया। इस युद्ध में राजपूतों को मुगलों का रण-चातुर्य एवं सैनिक व्यवस्था देखने का अवसर मिला। तोपखाना और गतिशील अश्वारोहियों का प्रभाव भी उन्होंने देखा, लेकिन युद्ध प्रणाली के इन परिवर्तनों को देखकर भी उनकी उपेक्षा की। जब विलम्ब से ध्यान दिया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। खानवा में राजपूतों की हार से राजस्थान की सदियों पुरानी स्वतन्त्रता तथा उसकी प्राचीन हिन्दू संस्कृति को सफलतापूर्वक अक्षुण्ण बनाये रख सकने वाला अब यहाँ कोई नहीं रह गया। मुगल साम्राज्य ने राजस्थान की स्वतन्त्रता का अन्त कर दिया, और राजनीतिकशक्ति के पतन के बाद राजस्थान की संस्कृति, वहाँ की विद्या और कला का भी ह्रास होने लगा। नये नये प्रभाव उन पर पड़ने लगे तथा विदेशी भावनाओं से वे अछूते नहीं रह सके, जिससे आगे चलकर उनका मध्यकालीन स्वरूप ही बदल गया। सुदूरस्थ विदेशों से आने वाले इन विधर्मी आक्रमणकारी मुगलों ने राजनीतिक एकता के साथ ही धीरे-धीरे समस्त राजस्थान की संस्कृति तथा साहित्य में एक अनोखी समानता भी उत्पन्न कर दी थी।

मुगल साम्राज्य की स्थापना के बाद उत्तरी भारत में उत्पन्न होने वाली नयी सम्मिलित हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति का प्रभाव कुछ समय बाद राजस्थान निवासियों के आचार-विचार, रहन-सहन, वेश-भूषा तथा खान-पान तक में दिखायी पड़ने लगा। इन सारी नयी-नयी प्रवृत्तियों तथा महत्त्वपूर्ण क्रान्तिकारी प्रभावों का प्रारम्भ खानवा के युद्ध के बाद तथा उसी के परिणामों के फलस्वरूप ही हो सका था।

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