ईडर पर आक्रमण


पूर्व में बताया जा चुका है कि गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह के आदेशानुसार निजाम-उल मुल्क ने भारमल को ईडर का राज्य दिलवा दिया था। रायमल अपने अधिकारी को भारमल की सहायता के लिए छोड़ वापिस लौट गया। उसके लौटते ही रायमल ने भीषण आक्रमण कर पुनः ईडर पर अधिकार कर लिया। इससे क्रुद्ध हो गुजरात के ने ईडर पर धावा बोल दिया। रायमल पुनः पहाड़ों में भाग गया। सुल्तान ने मुबारिज- उल-मुल्क को ईडर सौंप दिया और स्वयं वापिस लौट गया। वीर विनोद के लेखक (श्यामलदास लिखते हैं कि लौटते समय सुल्तान ने एक जानवर का नाम सांगा रखकर उसे नगर के प्रवेश द्वारा पर बाँध दिया। राणा सांगा को जब इसकी जानकारी मिली तो वह अपना अपमान न सह सका और उसने ईडर पर आक्रमण करने का निश्चय कर लिया। कुछ दन्त- कथाओं के अनुसार मुबारिज-उल मुल्क ने भरे दरबार में राणा सांगा के लिए बड़े अपशब्द काह, जिसकी जानकारी मिलने पर सांगा ने ईडर पर आक्रमण करने का निश्चय कर लिया। लेकिन ये सभी विवरण उचित प्रतीत नहीं होते। सांगा द्वारा ईडर पर आक्रमण करने का कारण शख राजनीतिक था। रायमल सांगा का कट्टर समर्थक था और सांगा की सहायता से ही उसने हर की गद्दी प्राप्त की थी। लेकिन गुजरात के सुल्तान ने उसे गद्दीच्युत कर दिया तो उसे पुनः इत डर की गद्दी पर बैठाना सांगा का नैतिक दायित्व था। भौर राणा सांगा एक विशाल सेना लेकर पहले सिरोही पहुँचा तथा यहाँ के शासक से बकाया खिराज वसूल कर दूंगरपुर की ओर बढ़ा, जहाँ का शासक भी ससैन्य सांगा के साथ चल दिया।

ईडर के मुस्लिम अधिकारी मुबारिज-उल-मुल्क ने सांगा के इस अभियान की नवा सूचना गुजरात दरबार को भेजते हुए सहायता की याचना की। किन्तु गुजरात दरबार की रके दलबन्दी के कारण उसे समय पर कोई सहायता नहीं भेजी जा सकी। इसी बीच सांगा ईडर पहुंच गया। ईडर का राज्य राठौड़ राजपूतों का राज्य होने के कारण मारवाड़ का राठौड़ शासक राव गांगा भी सेना सहित वहाँ पहुँच गया। राजपूतों की विशाल सेना देखकर भयभीत जा मुबारिज-उल-मुल्क ससैन्य गुजरात की तरफ भाग गया। ईडर पर सांगा का अधिकार हो गया हो और सांगा ने ईडर का राज्य रायमल को सौंप दिया। दूसरे दिन सांगा ने भागती हुई मुस्लिम सेना का पीछा किया और अहमदनगर पहुँच गया। राजपूत ख्यातों के अनुसार घमासान युद्ध के नक बाद अहमदनगर दुर्ग पर सांगा का अधिकार हो गया और मुबारिज-उल-मुल्क अहमदाबाद का की तरफ भाग गया। सांगा आस-पास के क्षेत्रों को लूटता हुआ बड़नगर और विशालनगर गया, रख फिर चित्तौड़ लौट आया। फारसी इतिहासकारों के अनुसार राणा को अहमदनगर के बाहर लडाई में परास्त होकर लौटना पड़ा। परन्तु यह कथन विश्वसनीय नहीं है।

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