खानवा युद्ध के परिणाम

अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण और खानवा युद्ध दूरगामी सिद्ध हुए। खानवा का युद्ध देश के निर्णायक युद्धों में माना जाता है। कुछ विद्वानी तो इसे भारतीय इतिहास में पानीपत के प्रथम युद्ध से भी अधिक महत्त्वपूर्ण माना है सांगा की यह पराजय केवल राजस्थान के लिए ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारत के लिए पाता प्रमाणित हुई। इस पराजय ने राजपूतों की रही-सही एकता को ही समाप्त नहीं किया, बलि मुगल शक्ति…

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राणा सांगा की पराजय के कारण-

खानवा क युद्ध मराणा सांगा की निर्णय पराजय हुई। प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि सांगा के पास, बाबर की अपेक्षा अधिक मना हुए भी तथा श्रेष्ठ सैनानायकों के होते हुए भी सांगा की पराजय क्यों हुई? खानवा के युद्धराणा सांगा की पराजय के अनेक कारण थे, जिनमें मुख्य निम्नलिखित थे। (1) राजपूत सेना संख्या में मुगलों से अधिक होते हुए भी एक नेता के अधीन संगठित नहीं थी, बल्कि…

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खानवा का युद्ध (मार्च, 1527 ई.)

-मार्च, 1527 के आरम्भ में राणा सांगा और बाबर की सेनाएँ खानवा के मैदान में आमने-सामने आ डटीं। यद्यपि फारसी इतिहासकारों ने तथा स्वयं बाबर ने राणा सांगा के सैनिकों की संख्या बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ा कर बतलायी है। फिर भी, इसमें कोई सन्देह नहीं कि बाबर की तुलना में सांगा के पास अधिक सैनिक थे। परन्तु बाबर के पास एशिया का सर्वश्रेष्ठ तोपखाना था, जबकि सांगा के पास इसका सर्वथा…

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राणा सांगा और बाबर

यद्यपि राणा सांगा ने भारत के शक्तिशाली सुल्तानों को पराजित कर सम्पूर्ण भारत में ख्याति अर्जित करली थी, परन्तु उसे अब उसके समान ही साहसी एवं पराक्रमी से मुकाबला करना था, और वह पराक्रमी था-जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर । भारत में मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर की गणना एशिया के श्रेष्ठ एवं सम्मानित शासकों में की जाती है। बाबर ने भी राणा सांगा की भाँति जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे थे।…

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राणा सांगा का चरमोत्कर्ष

-1519 ई. से 1526 ई. का काल राणा सांगा की शक्ति का चरमोत्कर्ष काल माना जा सकता है। 1519 ई. में सांगा गागरोण के युद्ध में विजयी होकर मालवा के सुल्तान महमूद खलजी द्वितीय को बन्दी बनाकर चित्तौड़ ले आया था।1 इसके बाद तो निरन्तर उसकी शक्ति बढ़ती गयी। 1526 ई. में सांगा द्वारा दिल्ला सुल्तान इब्राहीम लोदी को पराजित करना उसकी शक्ति का मीत्कर्ष था। अब तक अनेक हिन्दू…

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दिल्ली सल्तनत और सांगा

-सिकन्दर लोदी की मृत्यु के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र इब्राहीम लोदी 22 नवम्बर, 1517 ई. को दिल्ली के तख्त पर आसीन हुआ। सिकन्दर लोदी के अन्तिम दिनों में सांगा ने दिल्ली सल्तनत को निर्बल देखकर दिल्ली सल्तनत के अधीन वाले मेवाड़ की सीमा से लगे कुछ भागों को अधिकृत कर अपने राज्य में मिला लिया था। सिकन्दर लोदी की मृत्यु के बाद इब्राहीम लोदी और उसके छोटे भाई जलालखाँ के…

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गुजरात के सुल्तान द्वारा आक्रमण

-राणा सांगा द्वारा ईडर पर अधिकार करने तथा की मुस्लिम सेनाओं की पराजय ने गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह द्वितीय को क्रुद्ध कर दिया और उसने मेवाड़ पर आक्रमण करने का निश्चय किया। तदनुसार सुल्तान ने एक विशाल सेना के साथ मलिक एयाज और किवा-उल-मुल्क को मेवाड़ की तरफ भेजा। 1521 ई. के आरम्भ में गुजराती सेना मोडेसा पहुँची, जहाँ से कुछ सैनिक दस्ते बागढ़ क्षेत्र पदाकान्त करने भेजे गये। इसी…

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ईडर पर आक्रमण

पूर्व में बताया जा चुका है कि गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह के आदेशानुसार निजाम-उल मुल्क ने भारमल को ईडर का राज्य दिलवा दिया था। रायमल अपने अधिकारी को भारमल की सहायता के लिए छोड़ वापिस लौट गया। उसके लौटते ही रायमल ने भीषण आक्रमण कर पुनः ईडर पर अधिकार कर लिया। इससे क्रुद्ध हो गुजरात के ने ईडर पर धावा बोल दिया। रायमल पुनः पहाड़ों में भाग गया। सुल्तान ने…

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गागरोण का युद्ध

-गुजरात की सहायता से माण्डू प्राप्त करने के बाद भी खलजी द्वितीय को मेदिनीराय का भय बना रहा, क्योंकि उसे विश्वास था कि मेदिनीराय अपने पत्र और परिवार के सदस्यों की मौत का बदला लेकर रहेगा। अत: सांगा के लौटने के बाद वह मेदिनीराय की शक्ति को कुचलने के उद्देश्य से एक विशाल सेना लेकर गागरोण का ओर बहा। मेदिनीराय को इसकी सूचना मिलते ही उसने सांगा को सहायता देने…

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मालवा की समस्यामालवा की समस्या

-पूर्व पृष्ठों में बतलाया जा चुका है कि मालवा के सुल्तान महमूद खलजी द्वितीय ने मेदिनीराय की सहायता से अपनी स्थिति मजबूत करली थी। कुछ ही दिनों में मालवा की शासन व्यवस्था पर मेदिनीराय का पूरा नियन्त्रण स्थापित हो गया तथा मेदिनीराय ने अपनी शक्ति इतनी बढ़ा ली कि महमूद खलजी केवल नाममात्र का सुल्तान रह गया। इससे मालवा के मुस्लिम सरदारों में भीषण असन्तोष उत्पन्न हो गया। उन्हें इस…

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