मण्डौर के प्रतिहार


आदिपुरुष हरिशचन्द्र-प्रतिहारों की 26 शाखाओं में मण्डौर के प्रतिहार सबसे प्राचीन एवं महत्त्वपूर्ण शाखा थी। इनके बारे में हमें जोधपुर के एक शिलालेख (836 ई. का) और घटियाले के दो शिलालेखों (पहला 837 ई. का और दूसरा 861 ई. का) से थोड़ी- बहुत जानकारी मिलती है। इनसे पता चलता है कि मण्डौर के प्रतिहार हरिशचन्द्र एवं उसकी क्षत्राणी पत्नी भद्रा से अपनी वंशोत्पत्ति मानते हैं। हरिशचन्द्र प्रतिहारों का गुरु भी था। वह वेद और अन्य शास्त्रों के अर्थ जानने में निपुण था। लोग उसे ‘रोहिलद्धि’ भी कहते थे। उसके दो पलियाँ थीं। एक ब्राह्मणी और दूसरी क्षत्राणी। क्षत्रिय कन्या से विवाह से ऐसा प्रतीत होता है कि हरिशचन्द्र प्रारम्भ में किसी क्षत्रिय शासक का सामन्त भी रहा हो। उसकी ब्राह्मण पत्नी से उत्पन्न सन्तान ब्राह्मण-प्रतिहार कहलाये और क्षत्रिय पत्नी भद्रा की सन्तान क्षत्रिय-परिहार (प्रतिहार) कहलाये। डॉ. दशरथ शर्मा की मान्यता है यह सोचने का कोई आधार नहीं है कि उनकी रगों में विदेशी रक्त था अथवा कि वे अपने आपको राम के छोटे अनुज लक्ष्मण का वंशज मानते थे। ओझा के अनुसार हरिशचन्द्र का समय छठी शताब्दी के आस-पास होना चाहिए। रज्जिल और उसके उत्तराधिकारी-हरिशचन्द्र को भद्रा से चार पुत्र हुए- भोगभट्ट, कदक (डॉ. दशरथ शर्मा ने कक्कुक लिखा है), रज्जिल और दह । इन चारों भाइयों ने मिलकर मण्डौर (माण्डव्यपुर) को जीत लिया और उसकी सुरक्षा के लिये प्राचीरों का निर्माण करवाया। भोगभट्ट सबसे बड़ा था परन्तु मण्डौर के प्रतिहारों की वंशावली हरिशचन्द्र के तीसरे पुत्र रज्जिल से प्रारम्भ होती है। रज्जिल का पुत्र नरभट्ट हुआ जिसे ‘पेलापेली’ भी कहा जाता था। यह उपनाम उसके साहसिक कार्यों का प्रतीक है। उसका पुत्र नागभट्ट बड़ा पराक्रमी शासक हुआ। डॉ. गोपीनाथ ने लिखा है कि, “जब उसने (नागभट्ट) देखा कि मण्डौर में प्रतिहारों की स्थिति सुदृढ़ हो गयी है तो उसने अपनी राजधानी को यहाँ से बदलकर मेड़ता स्थापित किया जो मण्डौर से 60 मील से भी अधिक दूरी पर है। इस परिवर्तन से स्पष्ट है कि शासकीय सुविधा के लिये उसे ऐसा करना पड़ा था। इससे यह भी प्रमाणित होता है कि तब तक प्रतिहारों का राज्य भी विस्तृत हो चुका था जिसके लिए मेड़ता अपनी केन्द्रीय स्थिति के लिए अधिक उपयुक्त हो सका।” इसमें कोई सन्देह नहीं कि राजधानी परिवर्तन का मण्डौर के प्रतिहारों की बढ़ती हुई शक्ति एवं प्रभाव क्षेत्र से गहरा सम्बन्ध रहा होगा। नागभट्ट का बड़ा लड़का तात था। वह आध्यात्मिक प्रकृति का व्यक्ति था।उसने अपने छोटे भाई, भोज के पक्ष में राजसिंहासन त्याग दिया और स्वयं मण्डौर के पवित्र आश्रम में जाकर धर्माचरण में लग गया, जहाँ प्राकृतिक नदियों और नालों से चारों ओर के वातावरण शान्त था। डॉ. दशरथ शर्मा ने लिखा है कि कुछ विद्वानों ने यह सिद्ध करने प्रयास किया है कि ह्वेनसांग के गुर्जर प्रदेश के भ्रमण के समय यही भोज शासक रहा होगा, परन्तु उनके कथन की पुष्टि किसी भी साक्ष्य से नहीं होती है। अत: यह मानना कि ह्वेनसांग की यात्रा के दौरान भोज ही शासक था, उचित नहीं होगा। शीलुक-तीन पीढ़ी के बाद, मण्डौर के प्रतिहार वंश में शीलुक नामक राजा हुआ। उसने अपने राज्य की सीमाओं का वल्ल और तमणी (त्रावणी-मालानी) तक विस्तार किया। उसने वल्ल-मण्डल के शासक भाटी देवराज को युद्ध में परास्त कर अपने लिये राजकीय छत्र एवं सम्मान प्राप्त किया। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शीलुक के पैतृक राज्य पर वल्ल (वर्तमान जैसलमेर का एक भाग) के लोग प्राय: हमले करते रहते थे। त्रावण या तबनक्षेत्र के लोग भी प्रतिहार राज्य पर आक्रमण करते रहते थे। अरब लेखकों के विवरणानुसार त्रावण का क्षेत्र पंजाब का वह हिस्सा था जो उत्तर-पश्चिमी राजस्थान के समीप है। जो भी कारण रहा हो शीलुक ने इस क्षेत्र के भाटियों को परास्त कर अपनी स्वतन्त्र सत्ता को स्थापित किया। डॉ. दशरथ शर्मा का मत है कि शायद इससे पूर्व मण्डौर के प्रतिहार भाटियों की संप्रभुता को मानते रहे हों और देवराज भाटी को परास्त करने के बाद अपने आपको स्वतन्त्र शासक कहने लगे हों। यदि त्रावणी भी उस समय में भाटियों के अधिकार में थी, तो उसकी प्राप्ति से प्रतिहार राज्य को उत्तर और उत्तर-पश्चिम दिशा में एक सुरक्षित सीमान्त मिल गया। डॉ. आर. सी. मजूमदार ने बाउक के जोधपुर शिलालेख के आधार पर यह मत स्थापित किया है कि शीलुक न केवल वल्ल-मण्डल का शासक ही था, अपितु वह गुर्जर राज्यों, जिनमें लाट और अवन्ति भी सम्मिलित थे, के संघ का अध्यक्ष भी था।

परन्तु डॉ.दशर थ सर्मा ने ठोस तर्कों के आधार पर इसका खण्डन किया है। उनका कहना है कि मजूमदार की इस परिकल्पना पर विश्वास करने के लिए ठोस साक्ष्यों की आवश्यकता है। शीलुक एक धर्म-परायण शासक था। उसने एक नगर की स्थापना की तथा सिद्धेश्वर महादेव का मन्दिर बनवाया। अरब वृत्तान्तों से पता चलता है कि शीलुक के समय में जुनैद के नेतृत्व में अरबों ने धावे मारने शुरू कर दिये थे और अरब आक्रान्ताओं ने बेलमान तथा जुर्ज पर अधिकार कर लिया था। उन्होंने मारमाड (मारवाड़) और मण्डल पर भी आक्रमण करने शुरू कर दिये थे। इनमें से मारवाड़ का कुछ इलाका तो शीलुक के राज्य में सम्मिलित रहा होगा जिसकी वजह से शीलुक को अरब आक्रान्ताओं से सतर्क रहना पड़ा होगा और अपने राज्य की सुरक्षा के लिये आवश्यक कदम भी उठाने पड़े होंगे। कक्क-शीलुक के बाद उसका पुत्र झोट मण्डौर के प्रतिहारों का शासक बना। उसने अपने शासन के अन्त में गंगा में मुक्ति प्राप्त की। उसका पुत्र भिल्लादित्य सिंहासन पर बैठा। वह भी अपने पिता की भाँति राज्य छोड़कर हरिद्वार चला गया और वहीं अपने प्राण त्यागे।

भिल्लादित्य के बाद उसका लड़का कक्क सिंहासन पर बैठा। वह जितना पराक्रमी था, उतना ही बड़ा विद्वान भी था। उसने प्रतिहार परिवार के पक्ष में गौड़ों के विरुद्ध मुंगेर के स्वामी नागभट्ट द्वितीय के सामन्तों में एक प्रमुख सामन्त था और बंगाल के धर्मपाल के विरुद्ध युद्ध में भाग लिया और गौड़ों को परास्त किया। डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार कक्क अपने लड़े गये युद्ध में भाग लिया था। कक्क स्वयं व्याकरण, ज्योतिष, तक और विविध भाषाओं का ज्ञाता था और एक निपुण कवि भी था। कफ की दी पलियाँ थी । भट्टि (भाटी) वंश की रानी पदमनी से बाठक और दूसरी रानी दुर्लभदेवी से कमकुक नाम के पुत्र हुए। बाउक-कवक के बाद बाठक सिंहासनारूढ़ हुआ। उसके शासनकाल का कुछ भाग शायद कन्नौज के रामभद्र के शासन से सम्बन्धित रहा हो। बाठक के समय में मयूर नामक राजा ने मण्डौर राज्य पर आक्रमण कर दिया। मयूर ने बालक के सम्बन्धी ब्राह्मण प्रतिहारों को परास्त करके खदेड़ दिया। इसके बाद मयूर बाठक पर आक्रमण करने के लिये आगे बढ़ा। भूअकूप नामक स्थान पर दोनों पक्षों के मध्य घमासान युद्ध लड़ा गया जिसमें बाठक नै साहस और शौर्य से अपने शत्रु राजा ‘मयूर’ और उसके सैनिकों का संहार किया। मयूर’ की पहचान करना कठिन है। डॉ. दशरथ शर्मा ने लिखा है कि यदि इस शब्द का जातिवाचक अर्थ लिया जाय तो यह मोरी जाति का कोई सामन्त हो सकता है क्योंकि उस समय में मोरी जाति का राजस्थान के कुछ क्षेत्रों पर शासन था। डॉ. शर्मा का यह भी मानना है कि अकृष का युद्ध वि. सं. 894 (837 ई.) के पहले हुआ होगा क्योंकि इस समय में उत्कीर्ण बाठक के शिलालेख में इस घटना का उल्लेख किया गया है। ओझा के मतानुसार यह वही बाटक है जिसने 837 ई. की प्रशस्ति में अपने वंश का वर्णन अंकित कराकर मण्डौर के एक विष्णु मन्दिर में लगवाया था। वहाँ से हटाकर पीछे किसी ने इस शिलालेख को जोधपुर शहर के कोट में लगा दिया। कक्कुक-बाठक के बाद उसका सौतेला भाई कक्कुक (कक्क और दुर्लभदेवी का पुत्र) मण्डौर के प्रतिहारों का शासक बना। उसने वि. सं. 918 (861 ई.) में दी शिलालेख उत्कीर्ण करवाये जो घटियाले के लेख के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन शिलालेखों से न केवल उसके स्वयं के बारे में अपितु उसके पूर्वजों के बारे में भी थोड़ी-बहुत जानकारी मिलती है। प्रथम शिलालेख पता चलता है कि कक्कुक ने अपने सच्चरित्र से मरु, माड़ (जैसलमेर) वल्ल, तमणी (त्रवणी-मलानी), अज्ज (मध्यदेश) एवं गुर्जरात्र के लोगों का अनुराग अर्जित किया। डॉ. गोपीनाथ का मत है कि “हो सकता है कि ये उल्लेख उसकी विजय के द्योतक न हों पर इनसे यह तो प्रमाणित है कि उपर्युक्त वर्णित भागों में उसका राजनीतिक प्रभाव अवश्य स्थापित हो गया था।” डॉ. दशरथ शर्मा ने लिखा है कि कक्कुक भोज प्रथम का समकालीन था और उपर्युक्त विवरण से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उपर्युक्त वर्णित भागों में उसकी प्रसिद्धि भोज के सेनानायक अथवा तन्त्रपाल के रूप में हुई होगी। यह सोचना कि 861 ई. के आस-पास भोज प्रथम ने अपने साम्राज्य के कुछ क्षेत्र खो दिये और कक्कुक अपने महाप्रभु के विरुद्ध इन क्षेत्रों पर काबिज हो गया होगा, सरासर अनुचित होगा, विशेषकर उस स्थिति में जबकि भोज प्रथम के इतिहास के बारे में हमें पर्याप्त जानकारी उपलब्ध है। ऐसा लगता है कि कक्कुक एक भला शासक था। उसने दो स्तम्भों का निर्माण करवाया। एक मण्डौर में और दूसरा घटियाले के निकट रोहिंसकूप में। दूसरे शिलालेख में एक बड़ी महत्त्व की ऐतिहासिक बात दी गई है। वह यह है कि रोहिंसकूप आभीरों के उपद्रव के कारण अच्छे नागरिकों के लिए रहने के योग्य स्थान नहीं था जिसे उसने भयरहित बनाकर आबाद किया। इसमें बाजारों की व्यवस्था की गई और तीनों वर्गों के रहने के मकान, सड़कों आदि का निर्माण करवाया गया। इस प्रकार की शान्ति स्थापित होने से ये नगर भले

आदमियों के रहने के योग्य स्थान बन गये। इस विवरण से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि कुक्कुक ने आभीरों का दमन कर मारवाड़ में शान्ति स्थापित कर नागरिक जीवन की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति की जिससे दूर-दूर से व्यापारी लोग आकर बस गये और यह भाग जन-जीवन तथा व्यापार के लिये उपयोगी बन गया। तीनों वर्गों के लिए उसने उद्योग और धन्धों की व्यवस्था पैदा कर दी। कक्कुक के अन्य शिलालेखों में उसके गुणों का विवरण है। इससे पता चलता है कि उसे सज्जनों की संगति, विनित स्त्रियों का साथ, पुत्र स्नेह, गुरु-भक्ति, कृतज्ञता, संगीत तथा पुष्पों से प्रेम था। डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने लिखा है कि “इन गुणों के उल्लेख में अतिशयोक्ति हो सकती है, परन्तु इनसे उसका एक सम्पन्न तथा सद्चरित्र शासक होना प्रतीत होता है। इससे यह भी प्रमाणित होता है कि वह एक लोकप्रिय शासक था, क्योंकि शासक के सभी गुणों की स्थिति उसमें कल्पित की गई है।” कक्कुक के उत्तराधिकारी-कक्कुक के उत्तराधिकारियों के बारे में हमें नाममात्र की जानकारी भी उपलब्ध नहीं है। सम्भव है कि वे लोग दिल्ली सुल्तान इल्तुतमिश के समय तक मण्डौर के स्वामी बने रहे होंगे। इस स्थिति में उन्होंने जालौर और कन्नौज के साम्राज्यिक प्रतिहारों की महत्त्वपूर्ण सेवाएँ की होंगी। परन्तु 861 से 1018 ई. तक उनके बारे में जानकारी के साधन नहीं हैं। प्राप्त साक्ष्यों से पता चलता है कि बारहवीं सदी के मध्य में मण्डौर के आस-पास के क्षेत्रों पर चौहानों का प्रभुत्व स्थापित हो गया था। परन्तु मण्डौर का दुर्ग प्रतिहारों की इन्दा नामक शाखा के अधिकार में बना रहा। अन्य प्रतिहारवंशियों ने शायद चौहानों के सामन्तों के रूप में शासन करना शुरू कर दिया। 1395 ई. में इन्दा प्रतिहार सामन्तों ने अपने राजा हम्मीर से परेशान होकर राठौड़ वीरम के पुत्र राव चूंडा को मण्डौर का दुर्ग दहेज में दे दिया। सम्भव है, चूंडा ने बलात् अधिकृत किया हो। जो भी हो, इस घटना के साथ ही प्रतिहारों का प्रभाव समाप्त हो जाता है और धीरे-धीरे समूचा मारवाड़ राठौड़ों के अधिकार में चला जाता है। मण्डौर के प्रतिहारों के राज्य विस्तार के सम्बन्ध में डॉ. गोपीनाथ शर्मा का अनुमान है कि वह वर्तमान जोधपुर से 40 मील उत्तर-पश्चिम और 60 मील के लगभग उत्तर-पूर्व में चारों ओर फैला हुआ था। डॉ. बैजनाथ पुरी ने लिखा है कि, “ऐसा प्रतीत होता है कि मण्डौर के गुर्जर-प्रतिहारों का राज्य-विस्तार काठियावाड़ तक विस्तृत था और राजस्थान के शेष भू-भाग पर कन्नौज के या मालवा तथा गुजरात के प्रतिहारों का शासन था।” मण्डौर के शासकों, उनकी रानियों तथा पुत्रों के विरुदों (महाराज्ञी, राज्ञि, भूधर, भूपति आदि) से अनुमान लगाया जा सकता है कि वे दीर्घकाल तक स्वतन्त्र शासकों के रूप में शासन करते रहे होंगे।

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