सांगा का राज्यारोहण

सांगा का राज्यारोहण-जब सांगा अज्ञातवास में था तब उसे मेवाड़ की गद्दी प्राप्त होना असम्भव दिखाई दे रहा था। किन्तु परिस्थितियाँ धीरे-धीरे उसके अनुकूल होती गयीं। जैसा कि पूर्व में बताया गया है जयमल, राव सुरतान के हाथों मारा गया और सिरोही से लौटते समय रास्ते में, अपने बहनोई द्वारा दिये गये विषयुक्त लड्डू खाने से पृथ्वीराज की मृत्यु हो गयी। अपनी मृत्यु से पूर्व पृथ्वीराज ने सारंगदेव की भी हत्या कर दी थी। बचा हुआ सूरजमल भी नये राज्य की स्थापना की तलाश में कांठल की ओर चला गया था। अतः सांगा के विरोधियों की समाप्ति हो चुकी थी तथा राणा रायमल के लिए सांगा को उत्तराधिकारी घोषित करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं रह गया था। ऐसी स्थिति में कर्मचन्द पंवार ने राणा रायमल को सांगा के बारे में सूचना भिजवाई। राणा जयमल ने तत्काल सांगा को चित्तौड़ बुला भेजा और उसे ‘महाराजकुमार’ का पद दिया। सम्भवतः जब रायमल मृत्यु शैय्या पर था तभी सांगा को अजमेर से बुलाया था। अत: रायमल की मृत्यु के बाद सांगा ‘महाराणा संग्रामसिंह’ के नाम से मेवाड़ की गद्दी पर बैठा। सांगा के राज्याभिषेक कि तिथि के बारे में विद्वानों में मतभेद हैं। डॉ. ओझा के अनुसार 24 मई, 1509 ई. को सिंहासन पर बैठा, जबकि कुछ विद्वानों के अनुसार वह 5 मई, 1509 ई. को गद्दी पर बैठा। तिथि जो भी रही हो, इसमें कोई सन्देह नहीं कि सांगा का शासनकाल न केवल मेवाड़ के इतिहास में बल्कि उत्तरी भारत के इतिहास में भी एक महत्त्वपूर्ण अध्याय रहा है। इसीलिए सोलहवीं शताब्दी के सभी इतिहासकारों ने इसका उल्लेख किया है। प्रारम्भिक कठिनाइयाँ-सांगा मेवाड़ का शासक बन तो गया, लेकिन उसने अनुभव कर लिया कि उसका राज्य चारों ओर से शत्रुओं से घिरा हुआ है। दिल्ली पर इस समय सिकन्दर लोदी (1498-1517 ई.) का शासन था। यद्यपि उसका अधिकांश समय विद्रोही अफगान सरदारों का दमन करने में ही व्यतीत हुआ, फिर भी उसने बिहार को जीतकर सल्तनत को मजबूत बनाया था। यद्यपि वह ग्वालियर नहीं जीत सका, परन्तु उसने धौलपुर, अवन्तगढ़, नरवर और चन्देरी पर अधिक कर सल्तनत की सीमाओं का विस्तार किया। उसने नागौर के मुस्लिम शासक मुहम्मदखाँ को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश कर राजस्थान पर भी अपना प्रभाव स्थापित करने का प्रयास किया। उसने रणथम्भौर जीतने का भी असफल प्रयास किया। उसकी मृत्यु के बाद इब्राहीम लोदी दिल्ली के तख्त पर आसीन हुआ। उसका प्रारम्भिक समय तो अपने विरोधियों का दमन करने में बीता और जब उसने राजस्थान की ओर कदम बढ़ाया तो उसे सांगा के हाथों पराजित होना पड़ा, जिसकी विस्तृत चर्चा आगे के पृष्टों में की जायेगी। सांगा के राज्यारोहण के समय मालवा में नासिरुद्दीन का शासन था। 1511 ई. में नासिरुद्दीन की मृत्यु के बाद वहाँ उत्तराधिकार का संघर्ष शुरू हो गया।

कुछ अमीरों के सहयोग से महमूद खलजी द्वितीय मालवा का सुल्तान बना, परन्तु कुछ ही दिनों बाद उसके विरोधी अमीरों के गुट ने उसके छोटे भाई साहिबखाँ को सुल्तान बना दिया। चन्देरी के राजपूत मेदिनीराय की सहायता से महमूद खलजी ने पुन: मालवा की सल्तनत हथिया ली। इस पर साहिबखाँ के सहयोगी अमीरों ने दिल्ली और मुजरात से सहायता प्राप्त की, तो मेदिनीराय ने महाराणा सांगा की सहायता प्राप्त की। इस प्रकार मालवा अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्षरत थे। के सुल्तान अपने गुजरात में महमूद बेगड़ा का शासन था।

उसके अन्तिम वर्ष पुर्तगालियों के वर्चस्व को समाप्त करने में व्यतीत हुए। नवम्बर 1511 ई. में उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र मुजफ्फरशाह द्वितीय गुजरात का शासक बना। उसने मालवा की राजनीति में खुलकर हस्तक्षेप किया तथा मेदिनीराय के प्रभाव को समाप्त करने में गहरी रुचि ली। परिणामस्वरूप उसे मेवाड़ के महाराणा सांगा से संघर्ष करना पड़ा। गुजरात के सुल्तानों ने मेवाड़ के क्षेत्रों को अधिकृत करने की अपनी नीति को जारी रखा। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि दिल्ली, मालवा और गुजरात के अलग-अलग मुस्लिम राज्यों से सांगा को विशेष भय नहीं किन्तु इन तीनों के संयुक्त होने पर मेवाड़ राज्य की भारी क्षति हो सकती थी। अत: सांगा ने अपने पूर्व के आश्रयदाता कर्मचन्द पंवार को अजमेर, परबतसर, माण्डल, फूलिया, बनेड़ा आदि परगने जागीर में देकर उसे उत्तरी-पूर्वी सीमा की सुरक्षा का दायित्व सौंपा। इसी प्रकार अपनी दक्षिणी और पश्चिमी सीमा की सुरक्षा के लिए सिरोही और बागड़ के शासकों से मैत्री सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया।

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