रायमल के पुत्रों में परस्पर विरोध

-राणा रायमल के 11 रानियाँ थीं जिनसे 13 पुत्र और 2 पुत्रियाँ हुई। पृथ्वीराज ज्येष्ठ पुत्र था और जयमल दूसरा पुत्र था तथा सांगा तीसरा पुत्र था। पृथ्वीराज और सांगा सगे भाई थे। रायमल अपने जीवनकाल में अपना उत्तराधिकारी निश्चित नहीं कर पाया था, जिससे उसके महत्त्वाकांक्षी पुत्र और चचेरे भाई एक-दूसरे के प्रति वैमनस्य रणने लगे। रायमल ने कुम्भलगढ़ की शासन व्यवस्था पृथ्वीराज को सौंप कर इस वैमनस्य में और वृद्धि कर दी। सांगा, रायमल का तीसरा पुत्र होते हुए भी मेवाड़ की गद्दी पर बैठने का स्वप्न देख रहा था, लेकिन रायमल के ज्येष्ठ पुत्रों-पृथ्वीराज और जयमल का दावा ज्यादा मजबूत था। रायमल का चाचा सारंगदेव भी मेवाड़ की गद्दी का उम्मीदवार था। कुम्भा के भाई खेमकरण का पुत्र सूरजमल तो रायमल को भी मेवाड़ का शासक स्वीकार करना आपत्तिजनक समझता था। ऐसी स्थिति में सांगा को सिंहासन प्राप्त होना दूर की कल्पना थी। रायमल के उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर इन सभी उम्मीदवारों में, रायमल के जीवनकाल में ही तनाव उत्पन्न हो गया था। डॉ. ओझा और हरबिलास शारदा ने एक जनश्रुति को स्वीकार करते हुए लिखा है कि एक दिन पृथ्वीराज, जयमल और सांगा अपने चाचा सारंगदेव के साथ एक ज्योतिषी के यहाँ पहुंचे और अपना भविष्यफल जानना चाहा। ज्योतिषी ने जन्मपत्रियों के आधार पर सांगा का राजयोग प्रबल बताया। महत्त्वाकांक्षी पृथ्वीराज इस भविष्यवाणी को सहन न कर सका और आवेश में आकर अपनी तलवार से सांगा पर आक्रमण कर दिया।

सांगा बच तो गया किन्तु तलवार को हूल से उसकी एक आख फूट गयी। इस पर सारंगदेव ने बीच में आकर दोनों को समझाया। उसने सांगा की आँख का इलाज भी करवाया, किन्तु सांगा की एक आँख हमेशा के लिए चली गयी। सारंगदेव ने तीनों भाइयों में मेल कराने का प्रयास किया और कहा कि ज्योतिषी के कथन पर विश्वास कर आपस में मनमुटाव करना अच्छा नहीं है। इससे तो अच्छा है कि भीमल गाँव की चारण जाति की पुजारिन से, जो चमत्कारिक है, अपना भविष्य लें। अतः तीनों भाई सारंगदेव के साथ भीमल गाँव की उस पुजारिन के पास पहुंचे। पुजारिन उस समय कहीं गयी हुई थी, अतः सभी वहाँ बैठकर उसका इन्तजार करने लगे। जब पुजारिन आयी तो सभी ने उससे अपना भविष्य जानने की इच्छा प्रकट की। पुजारिन ने भी ज्योतिषी की भविष्यवाणी का समर्थन किया। इसको सुनते ही तीनों में वहीं युद्ध आरम्भ हो गया। पृथ्वीराज सांगा पर टूट पड़ा। सारंगदेव ने किसी तरह सांगा को बचाया और सांगा वहाँ से भाग खड़ा हुआ। जयमल भी उसका पीछा करता हुआ सेवन्त्री गाँव आया। इस गाँव में राठौड़ बीदा ने सांगा को शरण दी, लेकिन राठौड़ बीदा जयमल के हाथों मारा गया। सांगा गोड़वाड़ के मार्ग से अजमेर पहुंचा, जहाँ कर्मचन्द पंवार ने उसे आश्रय दिया। इस प्रकार सांगा कई दिनों तक अज्ञातवास में रहा। इस सम्पूर्ण प्रकरण में कितना ऐतिहासिक सत्य है, यह कहना बड़ा मुश्किल है। डॉ. गोपीनाथ शर्मा का मानना है कि सांगा ने सारंगदेव को अपनी तरफ मिलाया, सारंगदेव को सूरजमल के भय के कारण किसी के सहयोग की आवश्यकता थी। पृथ्वीराज और जयमल तो राज्य के निकटतम अधिकारी थे, उनका भी एक गठबन्धन होना स्वाभाविक था। सारंगदेव का बीच-बचाव करने का प्रयत्न और अपने राजपूत साथियों के साथ भीमल गाँव आना भी एक षड्यन्त्र का सूचक है। इस सम्पूर्ण कथानक में संग्रामसिंह (सांगा) की महत्त्वाकांक्षा तथा उसकी पूर्ति के लिए सतर्कता स्पष्ट होती है।

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