प्रतिरोध की नीति : महाराणा सांगा

(The Policy of Resistance : Maharana Sanga) अपने पिता महाराणा कुम्भा की हत्या करके उदयसिंह (उदा) 1468 ई. में मेवाड़ की गद्दी पर बैठा। मेवाड़ के अधिकांश सामन्तों को पितृहन्ता उदा का गही पर बैठना पसन्द नहीं आया और उन्होंने कुम्भा के छोटे पुत्र रायमल को मेवाड़ की गही पर बैठाने का निश्चय का रायमल को चित्तौड़ आने का निमन्त्रण भेजा। इस समय रायमल अपनी ससुराल ईटर में सैन्य मेवाड़ की तरफ चल पड़ा। जावर के समीप दोनों पक्षों में युद्ध हुआ, जिसमें उदा पराजित हुआ। हरबिलास शारदा का मत है कि उदा ने अपनी स्थिति मजबूत बनाने तथा सिरोही और मारवाड़ के शासकों का समर्थन प्राप्त करने की दृष्टि से सिरोही के देवड़ाओं को आबू तथा मारवाड़ के जोधा को अजमेर का तारागढ़ दुर्ग ले लेने दिया। इतना ही नहीं, जोधा के पुत्र दूदा ने मेवाड़ के अधिकारियों को खदेड़ कर सांभर पर भी अधिकार कर लिया। लेकिन उदा ने उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की। उदा की इस नीति से अन्य मेवाड़ी सामन्त भी जो अब तक उसके पक्षधर थे, नाराज हो गये। फलस्वरूप, उदा की स्थिति दिन- प्रतिदिन कमजोर होती गयी और इसीलिए पानगढ़ और चित्तौड़ के समीप लड़े गये युद्धों में उदा पराजित हुआ और कुम्भलगढ़ चला गया। परन्तु कुछ दिनों बाद मेवाड़ी सामन्तों ने उसे वहाँ से भी खदेड़ दिया। 1473 ई. में रायमल ने लगभग पूरे मेवाड़ पर अधिकार कर लिया और तब वह मेवाड़ की गद्दी पर आसीन हुआ।

पितृघाती उदा अपने पुत्रों सहित मेवाड़ से भाग कर मालवा के सुल्तान गयासुद्दीन खलजी की शरण में माण्डू आया। उसने सुल्तान से सैनिक सहायता की प्रार्थना की तथा सुल्तान को अपने पक्ष में करने के लिए उदा ने अपनी पुत्री का विवाह भी सुल्तान के साथ करने की बातचीत की। लेकिन एक दिन अचानक बिजली के गिरने से पितृघाती उदा की वहीं मृत्यु हो गयी। उदा की मृत्यु के बाद भी सुल्तान ने मेवाड़ पर आक्रमण करने का विचार नहीं छोड़ा। उसनें ठदा के दोनों पुत्रों को राज्य दिलाने के बहाने, साथ लेकर, चित्तौड़ को जा घेरा। सुदृढ़ किले से राणा रायमल ने शत्रु सेना का डट कर मुकाबला किया। फलस्वरूप गयासुद्दीन को माण्डू लौटने के लिए विवश होना पड़ा। उदा के पुत्रों ने भागकर बीकानेर के राज्य में आश्रय लिया। राणा रायमल ने लगभग 36 वर्षों (1473-1509 ई.) तक शासन किया। किन्तु उसमें अपने पिता की भाँति शूरवीरता एवं कूटनीतिज्ञता का अभाव था। परिणामस्वरूप मेवाड़ के कुछ अधीनस्थ क्षेत्र उसके हाथ से निकल गये। आबू, तारागढ़ और सांभर तो उदा के शासनकाल में ही मेवाड़ से अलग हो चुके थे। रायमल ने इन्हें पुनः अधिकृत करने का कोई प्रयास नहीं किया। अब मालवा के सुल्तान ने रणथम्भौर, टोड़ा और बून्दी को अपने अधिकार में कर लिया। टोड़ा के शासक राव सुरतान ने मेवाड़ में आश्रय इस आशा से लिया था कि शायद मेवाड़ से उसे सहायता मिल जाय। राव सुरतान के साथ उसकी पुत्री तारा भी थी, जो अद्वितीय सुन्दर और वीरांगना थी। राव सुरतान ने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि वह अपनी का विवाह उस शूरवीर के साथ करेगा जो टोड़ा जीतकर उसे वापिस दिलायेगा। राणा रायमल | के द्वितीय पुत्र जयमल ने तारा की सुन्दरता पर आसक्त होकर उससे विवाह करने की जिद | की तथा राव सुरतान के साथ अत्यन्त ही अशिष्ट व्यवहार किया। क्रुद्ध राव सुरतान ने जयमल को मौत के घाट उतार दिया और राणा को सूचित कर दिया। डॉ. गोपीनाथ शर्मा उसका सोलंकियों के विरुद्ध लड़ते हुए मारा जाना बताते हैं। जयमल की मृत्यु के बाद रायमल के ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीराज ने तारा से विवाह करने का निश्चय कर टोड़ा पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। कुँवर पृथ्वीराज ने टोड़ा का राज्य राव सुरतान को सौंप दिया तथा वचनबद्ध राव सुरतान ने तारा का विवाह पृथ्वीराज से कर दिया। कणा मुसलमानों के हाथ से टोड़ा निकल जाने से मालवा का सुल्तान क्रुद्ध हो उठा और उसने | चाकसू, सीकर, नरेना, सांभर, आमेर और अजमेर पर अधिकार कर लिया। सुल्तान के वापिस लौटते ही पृथ्वीराज ने अजमेर पर पुनः अधिकार कर लिया। इससे क्रुद्ध होकर मालवा के नये सुल्तान नासिरुद्दीन ने 1503 ई. में चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया, लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली। डॉ. गोपीनाथ शर्मा लिखते हैं कि इस बार राणा रायमल ने उसे धन देकर लौटा दिया। जो भी हो, सुल्तान वापिस माण्डू लौट गया। इस घटना के दिनों बाद पृथ्वीराज को सिरोही जाना पड़ा। पृथ्वीराज की एक बहिन की शादी सिरोही के शासक राव जगमाल के साथ हुई थी, लेकिन वह पृथ्वीराज की बहिन को अत्यधिक कष्ट दे रहा था। अत: पृथ्वीराज अपने बहनोई को समाझाने सिरोही आया। कहा जाता है कि लौटते समय राव जगमाल ने विषयुक्त लड्डु पृथ्वीराज के साथ बँधवा दिये, जिनको खाने से रास्ते में ही पृथ्वीराज की मृत्यु हो गयी। इस प्रकार राणा रायमल के दो ज्येष्ठ पुत्रों का स्वर्गवास हो गया।

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