मेहरानगढ़ (जोधपुर)

मेहरानगढ़ (जोधपुर)- मारवाड़ के राठौड़ों की नई राजधानी जोधपुर का म नी मेहरानगढ़ दुर्ग राव जोधा ने बनवाया था। पुरानी राजधानी मण्डौर के किले को शत्रुओं की चढ़ाइयों से बेकार देख राव जोधा ने मण्डौर से 6 मील दक्षिण में चिड़ियानाथ की ट्रॅक नामक का एक पृथक् पहाड़ी पर ज्येष्ठ सुदी 11, वि, 1516, शनिवार (12 मई, 1459 ई.) से नया सुदृढ़ किला बनवाना प्रारम्भ किया। इस किले की नींव में दो जीवित पुरुष गाड़े गये थे। राजिया और उसका पुत्र । इस किले का नाम ‘चिन्तामणी’ रखा गया था लेकिन मोर के आकार का होने से मोरध्वज कहलाया और अब इसे मेहरानगढ़ कहा जाता है।

जोधपुर के चारों ओर मैदानी इलाका होने से मेहरानगढ़ बहुत दूर से दिखाई देता। मैदानी भूमि से यह किला 400 फुट ऊँचा है। इसका कोट 20 से 120 फुट ऊँचा और 124 15 फुट चौड़ा है। किले की लम्बाई 500 गज और चौड़ाई 250 गज है। किले के अनेक महल और सैनिकों के रहने के लिये आवास आदि बने हुये हैं। दुर्ग में प्रवेश करते। लिये दो द्वार हैं-एक तो जयपोल से उत्तर-पूर्व में और दूसरा फतेहपोल से दक्षिण-परित में, नगर के भीतर से है। फतेहपोल का निर्माण महाराजा अजीतसिंह ने 1707 ई. में मुगल पर अपनी विजय को यादगार में बनाया था। जयपोल का निर्माण वि. सं. 1865 (1808 1) में महाराजा मानसिंह ने जयपुर के महाराजा जगसिंह की सेना पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में बनवाया था। इस द्वार के बाहर दाहिनी ओर कुछ स्मारक और दो बड़ी छतरिय है जो उन सैनिकों की याद दिलाती है, जो इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुये थे। इस द्वार के भीतर की ओर दाँयीं तरफ कीरतसिंह की छतरी है जो यहाँ लड़ता हुआ मारा गया था शत्रुओं द्वारा उसका सिर काट देने के बाद भी उसका धड़ तब तक तलवार चलाता रहा जा तक कि खून ठण्डा पड़ने के कारण वह गिर न पड़ा। यहाँ से ऊपर की ओर देखने पर हमें लकड़ी का रहटनुमा चक्र दिखलाई पड़ता है जिसकी सहायता से जयपोल से ऊपरी हिस्से में पानी पहुँचाया जाता था। जयपोल में विशाल लोहे का फाटक लग रहा है, वह फाटक वि. सं. 1787 (1730 ई.) को जब महाराजा अभयसिंह ने अहमदाबाद जीता था, तब नीमाज के सदावत ठाकुर अमरसिंह द्वारा अहमदाबाद की लूट में से लाया गया था। उनके वंशजों में महाराजा मानसिंह ने लेकर यहाँ लगवाया था। इनके अलावा किले में गोपालपोल, भैरोंपोतधू वपोल, सूरजपोल, लोहपोल एवं लाखनपोल (डेढ़ कंगूरापोल) नामक 6 द्वार और है। लोहपोल राव जोधा ने बनवाया था, परन्तु राव मालदेव ने इसका अगला हिस्सा पुनः बनवान शुरू किया। परन्तु काम पूरा हुआ महाराजा विजयसिंह के समय में। मदमस्त हाथियों को टक्कर से दरवाजा टूट न जाये, इसलिये दरवाजे में लोहे के मजबूत फलक लगाये गये। इस द्वार की दीवारों पर जो हाथ खुदे हुए हैं, वे उन सतियों की याद दिलाते हैं जो इस असार संसार को छोड़कर अपने स्वर्गीय पतियों के साथ सहर्ष धधकती हुई चिता पर आरूढ़ हो । थी। इसी पोल के पास के कमरे में राज्य का सिलहखाना (शस्त्रागार) था। लाखनपोल अथवा और कंगूरे की पोल का निर्माण राज मालदेव ने करवाया था। यह बहुत ही छोटा और संका दरवाया है, जिसका उपयोग आपातकाल में किले से भाग जाने के लिए किया जाता रहा होगा। गोपालपोल और भैरोंपोल-दोनों पास-पास ही है। पहले-पहल जब यह किला बनवाया गया था, तब इसका विस्तार जिस सीमा तक था, उसे अब’जोधाजी का फलसा’ मते है।

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