जोधपुर का किला (मेहरानगढ़)

हिन्दू और मुस्लिम स्थापत्य शैलियों का मिला- जुला रूप है। डॉ. जगदीशसिंह गहलोत के अनुसार, “किले की इमारतें ऊँची और सुन्दर बढ़िया खुदाई के काम को, लाल पत्थर की जालियों से सुशोभित हैं।” जालियों के फलस्वरूप इमारतों में पर्याप्त प्रकाश रहता है। कई महलों की दीवारों और छतों पर कलात्मक चित्रकारी की छटा देखने को मिलती है। महलों में मोतीमहल, फूलमहल और फतहमहल अधिक आकर्षक हैं। मोतीमहल का निर्माण महाराजा सूरसिंह (1594-1619 ई.) के समय में हुआ था। बाद में महाराजा तख्तसिंह ने इसकी दीवारों और छत पर सोने का आवरण लगवा दिया था। इसकी दीवारों एवं छत पर मनमोहक चित्रकारी का काम किया हुआ है। खुले चौक की तरफ खुलने वाले दरवाजों में रंगीन शीशे लगे हुए हैं। दरवाजों और खिड़कियों के पीछे से रनिवास की महिलाएँ दरबार की कार्यवाही देख सकती थीं, परन्तु मार का कोई व्यक्ति उनकी झलक नहीं पा सकता था। सम्भवतः यह मुगल दरबार का की गई खुदाई का काम देखते ही बनता है। इसका निर्माण महाराजा अभयसिंह ने 1724 ई. के आस-पास करवाया था। इसे ‘अभय विलास’ भी कहा जाता है। महाराजा अभयसिंह अपने विश्वस्त सरदारों एवं अधिकारियों से यहीं पर विचार-विमर्श किया करते थे। महल की को दीवारों, स्तम्भों एवं छत पर हिन्दू देवताओं, राजाओं तथा फूल-पत्तियों की लघु चित्रकारी -1 की कलात्मकता देखते ही बनती है। बिना बीम (Beam) अथवा गर्डर के महल की लम्बी- ३ चौड़ी छत स्थापत्य कला का एक सुन्दर नमूना है। इस प्रकार की छत बनाने की तकनीक को है ‘लादरवा’ (Ladarwa) कहते हैं। इस तकनीक में लकड़ी की फर्श पर पहले चूने को डालकर उसे वर्षों तक सुखाया जाता है। जब चूने की छत मजबूत हो जाती है तो अपनी मनपसन्द = डिजाइन में उसे काट-छाँटकर भवन की छत के रूप में लगा दिया जाता था। बुरी नजर वालों B की दृष्टि से बचाने के लिए महल की छत में चार काले धब्बे भी देखने को मिलते हैं। न आजकल भी अन्धविश्वासी लोग अपने नवनिर्मित भवनों की बाल्कानियों में काले धागे = अथवा फुन्दे लटकाया करते हैं।

जब महाराजा अजीतसिंह ने मुगल अधिकारियों को खदेड़ – कर किले पर अपना अधिकार कर लिया, तब 1708 ई. के आस-पास उन्होंने फतहमहल का निर्माण करवाया था। राज्य के जवाहरात इसी महल में रखे जाते थे। इन इमारतों के अलावा, कई ख्वाबगाह का महल, तखविलास, दौलतखाना, नौकेलाब महल, बिचला महल आदि और a भी छोटे-बड़े महल है, जिन्हें राज्य के शासकों ने समय-समय पर बनाया था। किले में जनानामहल, तोपखाना, सिलहखाना और ‘पुस्तक-प्रकाश’ नामक राज्य का = पुस्तकालय भी है। भू-तल से दो मंजिले जनानामहल भी स्थापत्य कला के सुन्दर नमूने हैं। प्रत्येक मंजिल की ऊँचाई सामान्य से काफी अधिक है। लाल पत्थर से बना जनाना महल – तक्षण कला का एक सुन्दर नमूना है। महल के सात पृथक्-पृथक् प्रवेश द्वारों से लगता है कि अलग-अलग कक्षों में अलग-अलग रानियों का आवास रहा होगा। पुस्तक प्रकाश की स्थापना महाराजा मानसिंह ने 1805 ई. में की थी। इसमें कुल 1,286 पुस्तकें हैं जिनमें 1,230 हस्तलिखित संस्कृत आदि की पुरानी अनमोल पुस्तकें हैं। (वर्तमान में इसमें 10,000. से भी अधिक पुस्तकें एवं पाण्डुलिपियाँ हैं। इनमे लगभग 5,000 बहियाँ भी सम्मिलित है। विस्ता जिनसे राज परिवार के रीति रिवाजों, जनाना व सरदारों के जीवन के विषय में जानकारी मिलती है। किले में दौलतखाने के आँगन में महाराजा बख्तसिंह की बनवाई ‘सिणगार चौकी’ है। आयताकार संगमरमर की फर्श पर एक छोटी और सादी संगमरमर की चौकी है। इसका उपयोग मारवाड़ के राठौड़ महाराजाओं के राजतिलक के लिये किया जाता था। किले में चामुण्डादेवी का एक छोटा परन्तु भव्य मन्दिर भी है। इसका निर्माण राव जोधा ने करवाया था। वैसे चामुण्डा परिहारों की कुलदेवी थी। परन्तु जब से राठौड़ों ।। मण्डौर प्राप्त कर लिया था, तब से ही वे भी इसकी उपासना करने लगे। राव जोधा ने मण्डौर से चामुण्डा की मूर्ति लाकर अपने नये किले में स्थापित कर दी थी। 1857 ई. में मन्दिर के करीब वाले बासदखाने में भयंकर विस्फोट हो जाने से यह मन्दिर उड़कर शहर में आ पड़ा। था। परिणामस्वरूप लगभग दो सौ नागरिक अपने घरों में दबकर मर गये। महाराजा तख्तसिंह | इस मन्दिर का पुनर्निर्माण करवाया। किले में कुछ और मन्दिर भी हैं जिनमें ‘आनन्द घनजी’ और ‘मुरली मनोहर जी’ के मन्दिर मुख्य हैं। इन दोनों का निर्माण महाराजा अभयसिंह ने करवाया था। आनन्द घनजी के मन्दिर में स्थापित बिल्लौर पत्थर की पाँच मूर्तियों के बारे में कहा जाता है कि ये मूर्तियाँ महाराजा सूरसिंह को मुगल सम्राट अकबर से प्राप्त हुई थीं। मुरली मनोहर जी के मन्दिर में महाराजा गजसिंह ने 4 मन 22 सेर वजन की चाँदी की मूर्तियाँ बनवाकर स्थापित की थीं।

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