चौहान पृथ्वीराज तृतीय (Chowhan Prithvi Raj-III)


647 ई. में हर्षवर्धन की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु को लेकर 1200 ई. तक का कुछ भारतीय इतिहास में विशेष महत्त्व रखता है। इस काल में उत्तर, दक्षिण और सुदूर दक्षिण अनेक शक्तिशाली राजवंशों का उत्कर्ष और पराभव हुआ। ऐसे राजवंशों में चौहानों का स्थान काफी महत्त्वपूर्ण है। चौहानों ने राजस्थान तथा उसके आस-पास के क्षेत्रों में अपने कई शासन केन्द्र स्थापित कर लिये थे, जिनमें सांभर (शाकम्भरी) अथवा सपादलक्ष के चौहानों ने अपनी शूरवीरता तथा साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षा के कारण भारतीय इतिहास में अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया था। चौहानों की उत्पत्ति और मूल स्थान-चौहानों अथवा चाहमानों की उत्पत्ति तथा उनका मूल स्थान दोनों ही काफी विवादग्रस्त हैं। चन्दबरदाई के ‘पृथ्वीराज रासो’ तथा चारणों की अनुश्रुतियों में उन्हें ‘अग्निकुल’ का बताया जाता है, जबकि ‘पृथ्वीराज विजय’, ‘हम्मीर महाकाव्य’, ‘हम्मीर रासो’ के अनुसार वे सूर्यवंशी थे। कर्नल टॉड, डॉ. स्मिथ और क्रुक इत्यादि विद्वान उन्हें विदेशियों की संतान मानते हैं। राजस्थान के सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा और डॉ. गोपीनाथ शर्मा उन्हें ब्राह्मणों की सन्तान बतलाते हैं। चौहानों के मूल स्थान के बारे में भी भिन्न-भिन्न मत देखने को मिलते हैं। डॉ. गोपीनाथ शर्मा तथा कुछ अन्य विद्वान जांगल देश (बीकानेर, जयपुर तथा उत्तरी मारवाड़) और सपादलक्ष (सांभर) को चौहानों का मूल स्थान मानते हैं। डॉ. दशरथ शर्मा चित्तौड़ को मूल स्थान मानते हैं। ‘पृथ्वीराज विजय’, ‘हम्मीर महाकाव्य’ आदि के अनुसार ‘पुष्कर’ उनका मूल स्थान था। सम्भवतः सांभर-पुष्कर-सीकर का मध्यवर्ती क्षेत्र उनका मूल स्थान रहा होगा। प्रारम्भिक चौहान शासक-‘हम्मीर महाकाव्य’ और ‘पृथ्वीराज विजय’ के अनुसार चौहान वंश का संस्थापक चाहमान नामक व्यक्ति था। परन्तु बिजौलिया शिलालेखों के अनुसार वासुदेव नामक व्यक्ति ने सांभर (सपादलक्ष) के चौहान राज्य की नींव रखी थी। उसने सांभर झील का निर्माण करवाया था।

डॉ. गोपीनाथ ने उसका शासनकाल 550 ई. के आस-पास माना है। उसके उत्तराधिकारियों के बारे में विस्तृत एवं सही जानकारी नहीं मिलती। उनमें से एक दुर्लभराज प्रथम प्रतिहारों का सामन्त था और प्रतिहार सेनानायक के रूप में उसने गौड़ प्रदेश तक सफल धावे मारे थे। उसका पुत्र और उत्तराधिकारी गूवक प्रथम प्रतिहार सम्राट नागभट्ट द्वितीय का करद् सामन्त था। ऐसा कहा जाता है कि गूवक प्रथम (गोविन्द राज) ने सिन्ध के मुस्लिम गवर्नर को परास्त कर उसे प्रतिहार राज के पश्चिमी भाग में आगे बढ़ने से रोक दिया था। गूवक प्रथम के पश्चात् उसके पुत्र चन्द्रराज द्वितीय और पौत्र गूवक द्वितीय ने क्रमश: राज्य किया। गूवक द्वितीय के बाद उसका पुत्र चन्दन राज सिंहासन पर बैठा। उसके समय में चौहानों का दिल्ली के तोमरों के साथ संघर्ष शुरू हो गया। चन्दनराज ने तोमर नरेश रूद्रेन से युद्ध किया तथा उसे मौत के घाट उतार दिया। चन्दन के पुत्र तथा उत्तराधिकारी ‘वाक्पतिराज प्रथम’ के समय तक सांभर का चौहान वंश काफी शक्तिशाली हो गया था। उसने ‘महाराज’ की पदवी धारण की। वाक्पतिराज प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र सिंहराज सिंहासन पर बैठा। उसने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की जिससे स्पष्ट हो जाता है कि उसने प्रतिहारों के विरुद्ध अपनी स्वतन्त्रता घोषित कर दी थी। उसने दिल्ली के तोमरों को भी पराजित किया था। उसके बाद विग्रहराज द्वितीय चौहानों का राजा हुआ। हर्ष-शिलालेख के अनुसार वह प्रारम्भिक चौहान शासकों में सबसे अधिक शक्तिशाली और पराक्रमी था। उसने गुजरात के चालुक्य नरेश मूलराज प्रथम (942-94 ई.) पर आक्रमण किया तथा उसके राज्य को पदाक्रान्त करते हुए नर्मदा नदी तक पहुँच गया। विवश होकर मूलराज को उसके साथ सन्धि करनी पड़ी। अनुश्रुतियों के अनुसार उसने मुस्लिम आक्रान्ताओं से लोहा लिया था। उसके बाद उसका छोटा भाई दुर्लभराज द्वितीय राजा हुआ। उसने नाडौल के चौहानों को पराजित किया। उसका राज्य पूर्व में जयपुर तक, पश्चिम में जोधपुर तक, उत्तर में सीकर तक और ना दक्षिण में अजमेर तक विस्तृत था। उसका उत्तराधिकारी गोविन्दराज तृतीय हुआ। वह भी अपने पिता की भाँति एक पराक्रमी शासक था और उसने मुसलमानों से संघर्ष किया था। र गोविन्दराज के बाद वाक्पति द्वितीय सिंहासन पर बैठा। इसने मेवाड़ (आघाट) के शासक क अम्बाप्रसाद को युद्ध में मार कर ख्याति प्राप्त की।

कुछ ग्रन्थों में उसे चेदि के शासक और मालवा के भोज को पराजित करने वाला कहा गया है, परन्तु अन्य साक्ष्यों से इस विवरण की ल पुष्टि नहीं होती। वाक्पति द्वितीय के बाद वीर्यराम सिंहासन पर बैठा। उसे नाडोल के न्य चौहान नरेश के हाथों पराजित होना पड़ा। ‘सुर्जनचरित’ के अनुसार मालवा के परमार नरेश को भोज (1020-47) ने उसके राज्य पर आक्रमण किया और उसे मार डाला। उसके बाद है। चामुण्डराय और सिंहघाट ने क्रमश: शासन किया। सिंहघाट का उत्तराधिकारी दुर्लभराज मा। तृतीय हुआ। वह एक पराक्रमी शासक था। उसने गुजरात नरेश कर्ण से युद्ध किया और अन्त में मातंगो (मलेच्छों) से युद्ध करते हुए मारा गया। दुर्लभराज तृतीय के बाद क्रमशः उसके के भाइयों-वीरसिंह और विग्रहराज तृतीय ने राज्य किया। खें विग्रहराज तृतीय के बाद उसका पुत्र पृथ्वीराज प्रथम राजा बना। शिलालेखों के यी अनुसार वह 1105 ई. में शासन कर रहा था और उसने ‘परम भट्टारक महाराजाधिराज- के परमेश्वर’ की उपाधि धारण की थी। इससे पता चलता है कि वह अपने समय का एक नहीं, स्वतन्त्र और शक्तिशाली सम्राट था। उसका पुत्र एवं उत्तराधिकारी अजयराज भी अपने समय के का पराक्रमी शासक सिद्ध हुआ। उसने मालवा पर आक्रमण कर वहाँ के परमार राजा नरवर्मन को पराजित किया तथा उसके सेनापति सोल्लण को बन्दी बना लिया। पृथ्वीराज विजय’ में उसे गजनी की सेना पर विजय प्राप्त करने का श्रेय दिया गया है। परन्तु इस कथन की सत्यता में सन्देह है। अजयराज ने अजमेर नगर को बसाया। यही नगर बाद में चौहान साम्राज्य की राजधानी बना।

डॉ. गोपीनाथ शर्मा का मत है कि अजयराज के शासनकाल अर्णोराज (लगभग 1133 से 1155 ई. तक) इस वंश का प्रतापी शासक हुआ। रेवासा से प्रार दो शिलालेखों में उसे ‘महाराजाधिराज परमेश्वर’ कहा गया है। अजमेर संग्रहालय शिलाले के आधार पर यह माना जा सकता है कि उसने अजमेर के निकट तुरूष्कों (मुसलमानों का बुरी तरह से पराजित किया, मालवा के परमार नरेश नरवर्मन को पराजित किया, सिन्धु के ‘सरस्वती नदी तक अभियान किया और हरितानक (दिल्ली के आस-पास का क्षेत्र) देश आक्रमण किया। अर्णोराज को अपने पड़ौसी गुजरात के चालुक्यों के साथ भी संघर्ष पड़ा। चालुक्य चौहान संघर्ष जितना पुराना था उतना विवादास्पद भी है। कुल मिलाकर हर संघर्ष में चालुक्यों का पलड़ा भारी रहा। अर्णोराज एक महान निर्माता भी था। उसने अजमेर के आनासागर तथा अनेक मन्दिरों एवं भवनों का निर्माण करवाया। उसे उसी के पुत्र जगदेव मौत के घाट उतार दिया। जगदेव ने अपने पिता की हत्या करके सिंहासन पर अधिकार तो कर लिया परन्तु वह अधिक दिनों तक शासन नहीं कर पाया। उसके छोटे भाई विग्रहराज ने उसे युद्ध क्षेत्र में मौत के घाट उतार दिया और ‘विग्रहराज चतुर्थ’ के नाम से सिंहासन पर बैठा। उसने 1158 ई. से 1163 ई. तक शासन किया। वह एक पराक्रमी शासक था। उसने अपने सफल अभियानों के द्वारा चौहान साम्राज्य का काफी विस्तार किया। उसने तोमरों को पराजित करके दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्र को जीतकर अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया। मुसलमानों को पराजित करके पंजाब के कुछ क्षेत्रों को भी अपने राज्य में मिला लिया। अपने वंश के शत्रुओं-चालुक्यों से संघर्ष किया। कुमारपाल चालुक्य को पराजित करके पाली, जालौर और नागौर छीन लिया। उसने भादानकों को भी पराजित किया। डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार भादानक शेखावाटी के उत्तरवर्ती प्रदेश में रहते थे जो अब अहीरवाटी के नाम से जाना जाता है। विग्रहराज चतुर्थ केवल तलवार का धनी ही नहीं था, वरन् कविता के मर्म को भी जानने वाला, भावनाओं का सम्राट तथा विद्वानों का आश्रयदाता भी था। वह स्वयं भी एक अच्छा कवि और लेखक था जिसकी पुष्टि उसके द्वारा रचित ‘हरकेलि’ नाटिका से होती है। उसके दरबारी कवि सोमदेव का ‘ललित विग्रहराज’ नाटक अपने समय का प्रमुख ऐतिहासिक नाटक है। विग्रहराज चतुर्थ ने अजमेर में एक विद्यालय का भी निर्माण करवाया। टॉड ने इस भवन के बारे में लिखा है कि “वह हिन्दू शिल्पकला का प्राचीनतम और पूर्ण परिष्कृत नमूना है।” पृथ्वीराज विजय के अनुसार उसने अनेक दुर्गों का निर्माण करवाया था। विग्रहराज चतुर्थ के बाद अपर-गांगेय शासक बना परन्तु कुछ दिनों बाद युवावस्था में ही उसकी मृत्यु हो गई। उसके बाद पृथ्वीराज द्वितीय सिंहासन पर बैठा। उसने 1169 ई. तक शासन किया। उसके शासनकाल में भी मुसलमानों से संघर्ष चलता रहा। मुसलमानों के आक्रमणों को रोकने के लिए उसने पंजाब के आशिका-प्रान्त में अपने मामा गुहिल किल्हण को नियुक्त किया तथा सीमा पर कुछ और दुर्गों का निर्माण करवाया था। उसकी बाद अर्णोराज का सबसे छोटा पुत्र सोमेश्वर चौहानों का राजा बना।

सोमेश्वर का बचपन मृत्यु के गुजरात में बीता था। उसकी माता कांचनदेवी चालुक्य नरेश जयसिंह सिद्धराज की पुत्री थी। अर्णोराज और कुमारपाल के सम्बन्ध कभी भी मैत्रीपूर्ण न रहे परन्तु कुमारपाल ने बालक सोमेश्वर की पर्याप्त देखभाल की। सोमेश्वर ने पी कुमारपाल के अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। कुमारपाल ने सोमेश्वर का विवाह त्रिपुरी के शासक अचल की पुत्री करदेवी के साथ कर दिया था। इससे सोमेश्वर के दो पुत्र उत्पल हुए-थ्वीरान और हरिराज। सोमेश्वर ने 1177 ई. तक शासन किया।

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