मिहिरभोज


मागील नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज को जीतकर गुर्जर-प्रतिहारों के वर्चस्व को पुनः प्रतिष्ठित किया। चूँकि चक्रायुध बंगाल के धर्मपाल का आश्रित राजा था अतः धर्मपाल ने नागभट्ट द्वितीय पर आक्रमण कर दिया। परन्तु घमासान युद्ध में उसे नागभट्ट द्वितीय के हाथों पराजित होकर बंगाल लौटना पड़ा। नागभट्ट द्वितीय के बाद उसका पुत्र रामचन्द्र या रामभद्र 832 ई. में कन्नौज के सिंहासन पर बैठा। उसने केवल तीन वर्ष तक राज्य किया और यह अल्प समय भी अशान्ति, अव्यवस्था और संकट का रहा। सम्भवत: चन्देलों ने कालिंजर प्रदेश पर और मण्डौर के प्रतिहारों ने ‘गुर्जरात्र प्रदेश’ पर अधिकार कर अपने आपको कन्नौज के आधिपत्य से स्वतन्त्र कर लिया हो। यद्यपि ग्वालियर प्रशस्ति में लिखा है कि रामभद्र ने अपने सामन्तों की सहायता से अपने शत्रुओं का दमन किया परन्तु पालों के अभिलेखों के अनुसार पालवंशी देवपाल ने गुर्जर-प्रतिहारों को परास्त किया था। राज्यारोहण और समस्याएँ-रामभद्र के बाद उसका पुत्र भोज 836 ई. में सिंहासन पर बैठा। इतिहास में वह ‘मिहिरभोज’ के नाम से विख्यात है। मिहिरभोज अपने समय का उत्तर भारत का सबसे महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली सम्राट था। उसके विषय में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अनेक शिलालेख और साहित्यिक विवरण मिलते हैं जिनके आधार पर मिहिरभोज के इतिहास का निर्माण किया जा सकता है। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मिहिरभोज की माता का नाम अप्पादेवी था। प्रारम्भ में स्मिथ महोदय का विचार था कि वह 840 ई. में गद्दी पर बैठा, परन्तु शिलालेख मिल जाने के बाद सभी विद्वान यह स्वीकार करते हैं मिहिरभोज 836 ई. में गद्दी पर बैठा तथा अपने वंश के बिखरे वैभव को पुनः संगठित करने का प्रयत्न किया। विभिन्न शिलालेखों में उसे विभिन्न विरुदों से पुकारा गया है। उसे ‘आदिवराह’ तथा ‘प्रभास’ की उपाधियों से विभूषित किया गया है। अपने पिता रामभद्र के शासनकाल में प्रतिहार साम्राज्य की शक्ति का जो हास हो गया था, उसे उसने न केवल संगठित किया वरन् उसका विस्तार भी किया। अधिकार मिहिरभोज के समक्ष प्रथम प्रश्न प्रतिहार साम्राज्य के उन प्रदेशों पर पुनः करने का था, जो उसके पिता के निर्बल हाथों से निकल चुके थे। अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए भोज को उत्तर भारत में बंगाल के पालों से तथा उत्तर-पश्चिम में काश्मीर। लोहा लेना था। गुहिल तथा कलचुरी वंश ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी। राष्ट्र, सम्राट अमोघवर्ष अपनी आन्तरिक समस्याओं में उलझा हुआ था। इसका लाभ उठात हुए अपने पूर्व अपमान का बदला लेना था। अत: इस प्रतापी सम्राट ने अपना विजय अभिया, आरम्भ किया। कालंजर तथा गुर्जरात्र का अधिकार-भोज ने अपने पितामह के समय के वंशजों को पराजित किया, जिन्होंने उसके पिता रामभद्र के समय अपनी स्वतन्त्रता घोषित कर दी थी। वराह-ताम्रपत्र के अनुसार भोज ने सर्वप्रथम अपने पितामह नागभट्ट द्वारा दिये गरे कालंजर मण्डल दान-पत्र की पुनर्स्थापना कर दी थी। अत: ऐसा प्रतीत होता है । मिहिरभोज ने कालंजर मण्डल अर्थात् बुन्देलखण्ड पर अपना पुन: प्रभुत्व स्थापित कर लिया था, जो उसके पिता के शासनकाल में प्रतिहारों के हाथ से निकल गया था और चन्देलों में अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दिया था। मिहिरभोज के प्रपितामह वत्सराज ने गुर्जरात्र अर्थात् राजपूताना में दान-पत्र की स्थापना की थी। नागभट्ट द्वितीय ने उसे सक्रम रखा था परन्तु रामभद्र उस दान-क्रम को स्थिर न रख सका। मिहिरभोज ने उस दान-पत्र की पुनःस्थापना कर दी। इससे यह निष्कर्ष निकाला गया है कि राजपूताना के गुर्जरात्र प्रदेश पर मिहिरभोज ने पुन: अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। जोधपुर-अभिलेख से प्रकट होता है कि बाउक ने कुछ सैनिक अभियान किये थे। ऐसा प्रतीत होता है कि मण्डौर की सामन्तीय प्रतिहार शाखा ने इस क्रम में व्यवधान डाला था।

गुहिल और कलचुरियों पर विजय-उत्तर भारत में भोज ने हिमालय की तराई तक अपनी सीमाओं का विस्तार किया था। बालादित्य के चाटसू-अभिलेख के अनुसार गुहिल राजकुमार हर्षराज ने उत्तर के राजाओं पर विजय प्राप्त की तथा भोज को अश्व उपहार में दिये। डॉ. भण्डारकर के अनुसार उक्त भोज कन्नौज का प्रतापी शासक मिहिरभोज था। ऐसा प्रतीत होता है कि हर्षराज ने अपने शासक भोज के अधीन उत्तर के राजाओं से युद्ध किया था, जिससे प्रकट होता है कि गुहिल वंश भोज के अधीन था। कहला-अभिलेख से ज्ञात होता है कि भोज की सत्ता हिमालय के चरणातल तक फैली हुई थी। इस अभिलेख से यह भी विदित होता है कि गोरखपुर के कलचुरिवंशीय गुणाम्बोधिदेव ने भोज से कुछ भूमि प्राप्त की थी। अधिकांश विद्वानों ने इस भोज का समीकरण मिहिरभोज के साथ किया है। गुणाम्बोधिदेव भोज का समकालीन था। जिसकी पुष्टि गुणाम्बोधिदेव के नवें उत्तराधिकारी एक लेख से होती है। इससे प्रकट होता है कि कलचुरी वंश ने मिहिरभोज की अधीनता स्वीकार कर ली थी। बंगाल के पालों के साथसंघर्ष-कान्यकुब्ज (कन्नौज) में शक्ति को सुदृढ़ करके भोज ने बंगाल के पालों से लोहा लिया। उस समय बंगाल में उसका समकालीन पाल शासक देवपाल था।

देवपाल बड़ा ही शक्तिशाली शासक था, जिसने हिमालय से लेकर विन्ध्यपर्वत तक तथा पूर्वी सागर से लेकर पश्चिमी सागर तक समस्त प्रदेशों से कर वसूल किया। यद्यपि देवपाल के बेदला-अभिलेख और मुंगेर-अभिलेख में देवपाल की विजय-यात्राओं का वर्णन अत्यधिक अतिशयोक्तिपूर्ण है, परन्तु इतना निश्चित है कि देवपाल ने उत्तर भारत में कुछ सैनिक अभियान अवश्य किये थे। एक साथ दो शक्तियों के उदय होने से उत्तर भारत में दोनों का शक्ति परीक्षण होना अवश्यम्भावी था। कहल-अभिलेख के अनुसार गुणाम्बोधिदेव नागौड़ सम्राट के ऐश्वर्य को हर लिया। पूर्व में बताया जा भूका है कि गणाम्बोधिदेव गोज का समकालीन तथा अधीन शासक था। अत: यह सम्भव प्रतीत होता है कि गणाम्बोधिदेव ने भोज के साथ पाल नरेश देवपाल को पराजित किया। ग्वालियर अभिलेख से भी की पुष्टि होती है जिसमें कहा गया है कि देवपाल की लक्ष्मी ने भोज को अपना स्वामी किन्तु पालों के साथ हुए संघर्ष में जयलक्ष्मी कभी प्रतिहारों को तो कभी पालों को प्राप्त हुई थी। चूँकि भोज के शिलालेख उत्तर प्रदेश की पूर्वी सीमा के उस पर नहीं मिलते, अतः प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि फिर भोज ने किस प्रकार पाल प्रदेशों पर अधिकार किया? इसका निश्चित उत्तर देना तो सम्भव नहीं है, किन्तु डॉ. आर. एस. त्रिपाठी की यह सम्भावना ठोक प्रतीत होती है कि भोज के आगे बढ़ने पर उसे कुछ असफलतओं का सामना करना पड़ा। सम्भवतः बेदला-अभिलेख का अभिप्राय भी यही है कि भोज को देवपाल से पराजित होना पड़ा। दक्षिण-पश्चिम के प्रदेश–पालों के साथ होने वाले संघर्ष में व्यवधान देखकर मिहिरभोज ने अन्य दिशाओं में सैनिक अभियान किया। प्रतापगढ़-अभिलेख से विदित होता है कि भोज ने दक्षिण में सैनिक अभियान किये थे तथा चौहानों की सहायता से दक्षिणी राजपूताना तथा अवन्ति के चारों ओर के प्रदेशों पर, जो नर्मदा तक फैले हुए थे, अधिकार कर लिया। इन चौहानों का समीकरण शाकम्भरी के चौहानों से किया जा सकता है, क्योंकि नागभट्ट द्वितीय के समय से ही वे गुर्जर-प्रतिहारों के सामन्त के रूप में शासन कर रहे थे। ‘पृथ्वीराज विजय’ से पता चलता है कि चहमान गूवक की बहिन कलावती अपने पति ई कन्नौज सम्राट के अत्यधिक निकट थी। कन्नौज के सम्राट का समीकरण मिहिरभोज से हो सकता है, क्योंकि कलावती के पितामह गूवक प्रथम नागभट्ट द्वितीय का समकालीन था। इन वैवाहिक सम्बन्धों के कारण ही भोज को चौहानों की सहायता प्राप्त हुई थी। पश्चिमी भारत व मध्यप्रदेश पर अधिकार-उना-ताम्रपत्र से हमें जानकारी मिलती है कि बलवर्मन ने हूणों से पृथ्वी को मुक्त कराया था। डॉ. पुरी के विचार में बलवर्मन मिहिरभोज का सामन्त था। स्कन्द पुराण के वस्त्रापथ माहात्म्य से पता चलता है कि वनपाल ने भोज को सूचना दी कि गिरनार के जंगलों में एक अत्यधिक सुन्दर हरिणमुखी नारी य रहती है। भोज ने उसे प्राप्त करने के लिये रैवतक के वनों में अपनी सेना भेज दी तथा उस का परम सुन्दर नारी को कान्यकुब्ज लाया गया। इससे प्रकट होता है कि भोज ने सूरक्षेत्र तक की अपनी सेनाएँ भेजी थीं। कि 919 ई. के देवगढ़ लेख से ज्ञात होता है कि देवगढ़ अर्थात् झाँसी के प्रदेश में भोज ने विष्णुराम को अपना महासामन्त नियुक्त कर रखा था। 932 ई. व 933 ई. के ग्वालियर- हके अभिलेखों से हमें सूचना मिलती है कि ग्वालियर प्रदेश में भोज का एक अन्य पदाधिकारी नक अल्ल कार्य कर रहा था। इससे प्रकट होता है कि झाँसी और ग्वालियर के प्रदेशों पर भी भोज र्चत ने अपना अधिकार स्थापित किया था। मपि राष्ट्रकूटों से युद्ध-भोज के दक्षिण-पश्चिम अभिलेखों के अनुसार प्रतिहार र्णन सीमाएँ, , राष्ट्रकूट राज्य के निकट पहुँच गई। राष्ट्रकूट, प्रतिहारों के परम्परागत शत्रु थे ।

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