उज्जैन और कन्नौज के गुर्जर-प्रतिहार


पूर्वज प्रतिहारों ने मण्डौर से अपना राज्य विस्तार शुरू किया था और उनका हरिशचन्द्र नामक ब्राह्मण था। सम्भव है कि हरिशचन्द्र के समय से ही उसके वंशजों ने अपनी सुविधानुसार राजस्थान, गुजरात, मालवा, कनौज आदि क्षेत्रों में बसना शुरू कर दिया था और जब अवसर मिला अपने राज्य भी स्थापित करते चले गये। डॉ. ओझा का मत है कि इन प्रतिहारों ने सर्वप्रथा चावड़ा राजपूतों से भीनमान का राज्य अधिकृत किया और फिर आबू,

जालौर आदि क्षेत्रों को जीता, इसके बाद उन्होंने उज्जैन में अपनी राजधानी स्थापित की। कालान्तर में उन्होंने कन्नौज के क्षेत्र को अधिकृत कर कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया। उज्जैन के गुर्जर-प्रतिहार राजवंश का संस्थापक नागभट्ट प्रथम था। उसकी चौथी पीढ़ी में वत्सराज पराक्रमी निकला। उसने 783 ई. से 795 ई. तक शासन किया। इस समय कन्नौज पर राजा इन्द्रायुध का शासन था जिसे बंगाल के पालवंशी राजा धर्मपाल का संरक्षण प्राप्त था। वत्सराज ने धर्मपाल को परास्त कर दिया। परन्तु राष्ट्रकूट नरेश, ध्रुव ने वत्सराज को पराजित कर जालौर की तरफ खदेड़ दिया। ध्रुव के लौटते ही धर्मपाल ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया और इन्द्रायुध के स्थान पर चक्रायुध को कन्नौज के सिंहासन पर बैठाया। वत्सराज की मृत्यु के बाद उसका पुत्र नागभट्ट द्वितीय गुर्जर-प्रतिहारों के सिंहासन पर बैठा। यद्यपि प्रारम्भ में उसे राष्ट्रकूट नरेश गोविन्द तृतीय से परास्त हो जाना पड़ा परन्तु कछ वर्षों बाद उसने कन्नौज पर आक्रमण करके चक्रायुध को परास्त किया तथा कन्नौज पर अधिकार कर लिया। इसके बाद कन्नौज गुर्जर-प्रतिहारों की नई राजधानी बन गई।

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