अन्य महत्त्वपूर्ण दुर्ग

राजस्थान के अन्य महत्त्वपूर्ण दुर्गों में अचलगढ़, तारागढ़, सिवाणा और जालौर के दुर्ग उल्लेखनीय हैं। आबू पर्वत पर स्थित अचलगढ़ का दुर्ग तो इस समय बिल्कुल जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। इसका निर्माण महाराणा कुम्भा ने करवाया था। दुर्ग की तलहटी में अचलेश्वर महादेव का मन्दिर है। मन्दिर के चारों ओर बुर्जदार परकोटा बना हुआ है। तारागढ़ का दुर्ग, अजमेर नगर के पास बीठरी पहाड़ी पर स्थित है। जनश्रुति के अनुसार चौहान शासक अजयपाल ने इस दुर्ग का निर्माण करवाया था और उस समय इसे ‘अजयमेरु’ के नाम से पुकारा जाता था। मेवाड़ के राणा रायमल के पुत्र पृथ्वीराज ने इस दुर्ग के महलों का निमार्ण करवाया था तथा अपनी पत्नी ताराबाई के नाम पर इस दुर्ग का नाम ‘तारागढ़’ रखा। बाद में शाहजहाँ के एक सेनानायक विट्ठलदास गौड़ ने इस दुर्ग का जीर्णोद्धार करवाया तो इसे गढ़ बीठड़ी’ के नाम से पुकारा जाने लगा। गढ़ की बुर्जियाँ तथा दीवारें अत्यधिक सुदृढ़ बनी हुई हैं। गढ़ के सबसे ऊँचे भाग में मीरन साहब की दरगाह है। गढ़ का बुलन्द दरवाजा, आँगन और बरामदा सोलहवीं सदी के स्थापत्य के सुन्दर नमूने हैं। सिवाणा का दुर्ग जोधपुर से लगभग 45 मील दूर पश्चिम में स्थित है। पंवार शासक’ वीरनारायण ने इसका निर्माण करवाया था। बाद में यह मारवाड़ के राठौड़ शासकों के अधिकार में आ गया और उन्होंने यहाँ अपने लिये आवश्यक भवनों का निर्माण करवाया। इस दुर्ग में कल्ला और रायमलोत का थड़ा तथा कुछ ऊँचाई पर महाराजा अजीतसिंह का बनवाया हुआ दरवाजा, कोट और महल आज भी विद्यमान हैं। ये सभी भवन उस समय के स्थापत्य का अच्छा प्रदर्शन करते हैं । इसी प्रकार, जालौर का दुर्ग भी मारवाड़ का एक सुदृढ़ दुर्ग है। इसका निर्माण परमार शासकों ने करवाया था। दुर्ग व कस्बे में बने हुए प्राचीन भवन, मस्जिद, शाह की दरगाह, प्राचीन जैन मन्दिर, वीरमदेव की चौकी आदि उस काल की स्थापत्य कला के अच्छे नमूने हैं। कान्हड़देव द्वारा बनवायी गई बावड़ी और वीरमदेव द्वारा बनवाया गया दरवाजा भी काफी कलात्मक है। यहाँ के भव्य जैन मन्दिरों का स्थापत्य सौन्दर्य तो देखते ही बनता है।

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